वित्तीय आपातकाल किसे कहते हैं?
आसान शब्दों में कहे तो वित्तीय आपातकाल एक ऐसी स्थिति है, जब देश की आर्थिक हालात बेहद खराब हो जाते है। देश का खजाना खाली होने लगता है या देश पर बहुत बड़ा वित्तीय संकट (पैसों की भारी तंगी) आ जाती है।
जब देश का आर्थिक स्थिति या साख खतरे में पड़ जाती है, तब भारत के राष्ट्रपति संविधान के अनुच्छेद 360 का प्रयोग करके देश में वित्तीय आपातकाल की घोषणा करते हैं।
इसका सीधा सा मतलब है कि देश को बहुत बड़े आर्थिक नुकसान से बचाने के लिए केंद्र सरकार पूरे देश के पैसों और बजट का नियंत्रण अपने हाथ में ले लेती है।
वित्तीय आपातकाल लागू करने की प्रक्रिया
वित्तीय आपातकाल कैसे लगाया जाता है इसकी प्रक्रिया निम्नलिखित चरणों में होती है।
- राष्ट्रपति द्वारा घोषणा - जब राष्ट्रपति को यह पक्का विश्वास हो जाता है कि देश की आर्थिक स्थिति बहुत गंभीर हो चुकी है तो वह इसकी घोषणा करते हैं।
- संसद की मंजूरी - राष्ट्रपति द्वारा घोषणा किए जाने के बाद 2 महीने के भीतर संसद के दोनों सदनों से इसे पास होना जरूरी होता है।
- यदि लोकसभा भंग हो - अगर घोषणा के समय लोकसभा भंग हो चुकी हो तो राज्यसभा से मंजूरी मिलना जरूरी है और नई लोकसभा बनने के 30 दिनों के अंदर उससे भी मंजूरी लेनी पड़ती है।
वित्तीय आपातकाल का देश पर क्या प्रभाव पड़ता है?
जब देश में वित्तीय आपातकाल का लागू हो जाता है, तो इसके कई बड़े असर देखने को मिलते हैं:
- वेतन और भत्तों में कटौती - केंद्र और राज्य सरकार के सभी कर्मचारियों के वेतन और भत्तों में कटौती की जा सकती है।
- जजों के वेतन में कमी - भारत के सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के न्यायाधीशों के वेतन में भी कटौती की जा सकती है।
- राज्यों के पैसों पर केंद्र सरकार का नियंत्रण - राज्य सरकारों द्वारा पास किए जाने वाले धन विधेयक को राष्ट्रपति की मंजूरी के लिए भेजा जाता है। केंद्र सरकार राज्यों को पैसों के मामले में निर्देश दे सकती है।
- बजट और खर्चों पर रोक - सरकार गैर जरूरी खर्च पर तुरंत रोक लगा देती है ताकि देश का खजाना बचाया जा सके।
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वित्तीय आपातकाल कितने समय तक लागू रह सकता है?
वित्तीय आपातकाल की एक खास बात यही है कि इसके लागू रहने की कोई अधिकतम सीमा तय नहीं है। एक बार जब संसद से इसे मंजूरी मिल जाती है, तो यह तब तक लागू रहता है जब तक राष्ट्रपति इसे खुद आदेश जारी करके वापस ना ले ले। इस बार-बार संसद से आगे बढ़ाने की आवश्यकता नहीं पड़ती।
भारत में अब तक कितनी बार वित्तीय आपातकाल लगा है?
यह हम सभी के लिए बहुत गर्व की राहत की बात है कि भारत में आज तक एक बार भी वित्तीय आपातकाल नहीं लगाया गया है।
सन 1991 में जब भारत में बहुत बड़ा आर्थिक संकट आया था और देश का विदेशी मुद्रा भंडार लगभग खत्म होने की कगार पर था, तब भी भारत में वित्तीय आपातकाल लगाने की नौबत नहीं आई थी। उस समय सरकार ने आर्थिक सुधार करके स्थिति को संभाल लिया था।
परीक्षा के लिए मुख्य बिंदु
वित्तीय आपातकाल का उल्लेख संविधान के भाग 18 और अनुच्छेद 360 में है।
- इसे लागू करने की शक्ति केवल राष्ट्रपति के पास है।
- इसे संसद से 2 महीने के अंदर मंजूरी मिलना अनिवार्य है।
- भारत में यह आपातकाल एक भी बार नहीं लगा है।
निष्कर्ष -
वित्तीय आपातकाल संविधान में दिया गया एक ऐसा सुरक्षा चक्र है। जिसका इस्तेमाल देश को बहुत बड़े आर्थिक संकट से उभरने के लिए किया जाता है, हालांकि यह आम जनता और सरकारी कर्मचारियों के वेतन-भत्तों को प्रभावित करता है, लेकिन इसका मुख्य उद्देश्य देश की अर्थव्यवस्था को डूबने से बचाना होता है।

