तुलसीदास का जीवन परिचय | Goswami Tulsidas ka Jivan Parichay
रामचरितमानस जैसे महान ग्रंथ के रचयिता और भगवान राम के परम भक्त गोस्वामी तुलसीदास जी का नाम भारतीय साहित्य के आकाश में सूर्य के समान चमकता है। उन्होंने अपनी लेखनी से न केवल भक्ति का मार्ग प्रशस्त किया, बल्कि समाज को एक नई दिशा भी दी। आज के इस लेख में हम तुलसीदास जी के जीवन, उनकी प्रमुख रचनाओं और उनके संघर्षों के बारे में विस्तार से जानेंगे।
गोस्वामी तुलसीदास
(जीवनकाल : सन् 1532-1623 ई.)
जीवन परिचय –
रामभक्ति शाखा के कवियों में गोस्वामी तुलसीदास सर्वश्रेष्ठ कवि माने जाते हैं। इनका प्रमुख ग्रंथ ‘श्रीरामचरितमानस’ भारत में ही नहीं, वरन् संपूर्ण विश्व में विख्यात हैं। लोकनायक गोस्वामी तुलसीदास जी के जीवन से संबंधित प्रमाणिक सामग्री अभी तक नहीं प्राप्त हो सकी है।
कवि परिचय : एक दृष्टि में
डॉक्टर नगेंद्र द्वारा लिखित ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ में इनके संदर्भ में जो प्रमाण प्रस्तुत किए गए हैं, वे इस प्रकार हैं– बेनीमाधव प्रणीत ‘मूल गोसाईंचरित’ तथा महात्मा रघुवरदास रचित ‘तुलसीचरित’ में तुलसीदास जी का जन्म संवत् 1554 वि. (सन् 1497 ई.) दिया गया है। बेनी माधव दास की रचना में गोस्वामी जी की जन्म-तिथि श्रावण शुक्ल सप्तमी का भी उल्लेख है। इस संबंध में निम्नलिखित दोहा प्रसिद्ध है –
पंद्रह सौ चौवन बिसै, कालिंदी के तीर।
श्रावण शुक्ल सप्तमी, तुलसी धरयो सरीर।।
‘शिवसिंह सरोज’ में इनका जन्म संवत् 1583 वि. (सन् 1526 ई.) बताया गया है। पंडित रामगुलाम द्विवेदी ने इनका जन्म संवत् 1589 वि. (सन् 1532 ई.) स्वीकार किया है। सर जॉर्ज ग्रियर्सन द्वारा भी इसी जन्म संवत् को मान्यता दी गई है। निष्कर्ष रूप में जनश्रुतियों एवं सर्वमान्य तथ्यों के अनुसार इनका जन्म संवत् 1589 वि. (सन् 1532 ई.) माना जाता है।
इनके जन्म स्थान के संबंध में भी पर्याप्त मतभेद हैं। ‘तुलसी-चरित’ में इनका जन्म स्थान राजापुर बताया गया है, जो उत्तर प्रदेश के बांदा जिले का एक गांव है। कुछ विद्वान तुलसीदास द्वारा रचित पंक्ति ‘’मैं पुनि निज गुरु सन् सुनि, कथा सो सूकरखेत’’ के आधार पर इनका जन्मस्थल उत्तर प्रदेश स्थित एटा जिले के ‘सोरो’ नामक स्थान को मानते हैं, जबकि कुछ अन्य विद्वानों का मत है कि ‘सूकरखेत’ को भ्रमवश ‘सोरो’ मान लिया गया है। वस्तुत: यह स्थान आजमगढ़ में स्थित है। इन तीनों मतों में इनके जन्मस्थान को राजापुर माननेवाला मत ही सर्वाधिक उपयुक्त समझा जाता है।
जनश्रुतियों के आधार पर यह माना जाता है कि गोस्वामी तुलसीदास के पिता का नाम आत्माराम दुबे एवं माता का नाम हुलसी था। कहा जाता है कि इनके माता-पिता ने इन्हें बाल्यकाल में ही त्याग दिया था। इनका पालन-पोषण प्रसिद्ध संत बाबा नरहरिदास ने किया और इन्हें ज्ञान एवं भक्ति की शिक्षा प्रदान। इनका विवाह एक ब्राह्मण-कन्या रत्नावली से हुआ था। कहा जाता है कि ये अपनी रूपवती पत्नी के प्रति अत्यधिक आसक्त थे। इस पर इनकी पत्नी ने एक बार इनकी भर्त्सना की, जिससे ये प्रभु-भक्ति की ओर उन्मुख हो गए। संवत् 1680 (सन् 1623 ई.) में, काशी में इनका निधन हो गया।
साहित्यिक परिचय –
महाकवि तुलसीदास एक उत्कृष्ट कवि ही नहीं, महान् लोकनायक और तत्कालीन समाज के दिशा-निर्देशक भी थे। इनके द्वारा रचित महाकाव्य ‘श्रीरामचरितमानस’ ; भाषा, भाव, उद्देश्य, कथावस्तु, चरित्र-चित्रण तथा संवाद की दृष्टि से हिंदी-साहित्य का एक अद्भुत ग्रंथ है। इसमें तुलसी के कवि, भक्त एवं लोकनायक रूप का चरम उत्कर्ष दृष्टिगोचर होता है। ‘श्रीरामचरितमानस’ में तुलसी ने व्यक्ति, परिवार, समाज, राज्य, राजा, प्रशासन, मित्रता, दांपत्य एवं भ्रातृत्व आदि का जो आदर्श प्रस्तुत किया है, वह संपूर्ण विश्व के मानव समाज का पथ-प्रदर्शन करता रहा है। ‘विनयपत्रिका’ ग्रंथ में ईश्वर के प्रति इनके भक्त ह्रदय का समर्पण दिखाई देता है। इसमें एक भक्त के रूप में तुलसी ईश्वर के प्रति दैन्यभाव से अपनी व्यथा-कथा कहते हैं।
गोस्वामी तुलसीदास की काव्य प्रतिभा का सबसे विशिष्ट पक्ष यह है कि ये समन्वयवादी थे। इन्होंने ‘श्रीरामचरितमानस’ में राम को शिव का और शिव को राम का भक्त प्रदर्शित कर वैष्णव एवं शैव संप्रदायों में समन्वय के भाव को अभिव्यक्त किया। निषाद एवं शबरी के प्रति राम के व्यवहार का चित्रण कर समाज की जातिवाद पर आधारित भावना की निस्सारता (महत्वहीनता) को प्रकट किया और ज्ञान एवं भक्ति में समन्वय स्थापित किया।
कृतियां – ‘श्रीरामचरितमानस’, ‘विनयपत्रिका’, ‘कवितावली’, ‘गीतावली’, ‘श्रीकृष्णगीतावली’, ‘दोहावली’, ‘जानकी-मंगल’, ‘पार्वती-मंगल’, ‘वैराग्य-संदीपनी’, तथा 'बरवै-रामायण’आदि।
काव्यगत विशेषताएं –
(अ) भावपक्ष
महाकवि तुलसी ने अपनी अधिकांश कृतियों में श्रीराम के अनुपम गुणों का गान किया है। शील, शक्ति और सौंदर्य के भंडार मर्यादा पुरुषोत्तम राम इनके इष्ट देव हैं। तुलसी अपना संपूर्ण जीवन उन्हीं के गुणगान में लगा देना चाहते हैं।
तुलसी की भक्ति दास्य-भाव की है। इन्होंने स्वयं को श्री राम का दास और श्री राम को अपना स्वामी माना है। ये राम को बहुत बड़ा और स्वयं को दीन-हीन व महापतित मानते हैं। अपने उद्धार के लिए ये प्रभु-भक्ति की याचना करते हैं। यथा –
मांगत तुलसीदास कर जोरे। बसहु राम सिय मानस मोरे।।
तुलसी ने समग्र ग्रंथों की रचना ‘स्वांत:सुखाय’ अर्थात् अपने अन्तः करण के सुख के लिए की है। इन्होंने लिखा है–
स्वान्तः सुखाय तुलसी रघुनाथगाथा।
तुलसीदास जी समन्वय भावना के साधक हैं। इन्होंने सगुण-निर्गुण, ज्ञान-भक्ति, शैव-वैष्णव और विभिन्न मतों व संप्रदायों में समन्वय स्थापित किया। निर्गुण और सगुण को एक माना है। यथा –
अगुनहिं सगुनहिं नहिं कछु भेदा। गावहिं मुनि पुरान बुध वेदा।
तुलसी के काव्य में विभिन्न रसों का सुंदर परिपाक हुआ है। यद्यपि इनके काव्य में शांत रस प्रमुख है, तथापि श्रृंगार रस की अद्भुत छटा भी दर्शनीय है। श्री राम और सीता के सौंदर्य, मिलन तथा विरह के प्रसंगों में श्रृंगार का उत्कृष्ट रूप उपलब्ध है। इसके अतिरिक्त, करूण, रौद्र, बीभत्स,भयानक, वीर,अद्भुत एवं हास्य रसों का भी प्रयोग किया गया है। इस प्रकार तुलसी का काव्य सभी रसों का अद्भुत संगम है।
तुलसी के काव्य में दार्शनिक तत्वों की व्याख्या उत्तम रूप में की गई है। ब्रह्म, जीव, जगत् और माया जैसे गूढ़ दार्शनिक पहलुओं पर कवि ने अपने विचार बड़े ही प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किए हैं।
तुलसीदास ने अपने रामचरितमानस की भूमिका में लिखा है –
“स्वान्तः सुखाय तुलसी रघुनाथगाथा।
भाषा निबंध मति मंजुलमातनोति।।”
तुलसीदास के उक्त कथन में इनकी रामकथा के विविध स्रोतों की ओर संकेत तो हैं ही, साथ ही इसमें तुलसीदास के भाषा ज्ञान का संकेत भी निहित है। इन्होंने ‘श्री रामचरितमानस’ की रचना जिस भाषा में की है, वह अवधि है, किंतु इन्हें अन्य भाषाओं का भी ज्ञान था। इनकी ‘कवितावली’ में ब्रजभाषा का सुंदर प्रयोग हुआ है। इसी प्रकार श्रीकृष्णगीतावली की रचना भी बृज भाषा में हुई है। श्री रामचरितमानस प्रधान रूप से अवधि की रचना होते हुए भी इसमें ब्रज का पुट भी प्राप्त होता है। साथ ही संस्कृत का प्रयोग भी इसमें हुआ है। इसके अतिरिक्त तुलसीदास को प्राकृत एवं अपभ्रंश का भी ज्ञान था। यद्यपि अवधि और ब्रजभाषा इन्हें परंपरा से प्राप्त हुई परंतु अवधी बोली को साहित्य के आसन पर प्रतिष्ठित करने में इनका योगदान सर्वोपरि है।
तुलसीदास संस्कृत के अच्छे ज्ञाता थे, अतः इनके साहित्य में तत्सम शब्दावली का प्रयोग प्रचुर परिमाण में हुआ है, किंतु तद्भव और देशज शब्दों का इनके काव्य में नितांत अभाव नहीं है। साथ ही विदेशी शब्दावली (अरबी-फारसी इत्यादि के शब्दों) का तुलसीदास ने सर्वथा त्याग नहीं किया है। इनके काव्य में जहां तद्भव शब्दों; यथा– बांझ,अहेर,नैहर, गांठि इत्यादि का प्रयोग है, वहीं साहिब, गरीब, फौज इत्यादि अरबी शब्दों का खजाना, शहनाई, बाजार, दरबार इत्यादि फारसी शब्दों का भी प्रयोग तुलसीदास ने किया है। इन्होंने अपनी भाषा में मुहावरों और लोकोक्तियों का प्रयोग भी किया है।
शैली – शैली की दृष्टि से तुलसीदास जी के काव्य में विविधता के दर्शन होते हैं। तुलसी ने अपनी रचनाओं में सभी प्रचलित शैलियों का प्रयोग किया है। इनकी शैली की प्रमुख विशेषताएं हैं – स्वाभाविकता, सरलता, सरसता और नाटकीयता। तुलसीदास के काव्य में जिन विविध शैलियों के दर्शन होते हैं, वे हैं –
दोहा-चौपाई पद्धति – रामचरितमानस में प्रयुक्त।
कवित्त-सवैया पद्धति – कवितावली में प्रयुक्त।
दोहा पद्धति – दोहावली में प्रयुक्त।
गेयपद शैली – विनयपत्रिका और गीतावली में प्रयुक्त।
स्रोत शैली – रामचरितमानस और विनय पत्रिका में प्रयुक्त।
लोकगीत शैली – रामलला नहछू तथा पार्वतीमंगल में प्रयुक्त।
तुलसीदास जी की शैली की एक विशेषता है – बिम्बग्रहण। भावों में आवेग के चित्रण में तुलसीदास जी ने इसी बिम्बग्रहण शैली या शब्द-चित्र निर्माण शैली को अपनाया है।
तुलसीदास जी ने अनेक अलंकारों का प्रयोग अपने काव्य में किया है। तुलसीदास के काव्य में अनुप्रास अलंकार पर्याप्त परिमाण में प्रयुक्त हुआ है। रूपक और उत्प्रेक्षा तुलसी को प्रिय हैं, उपमा पर इनका विशेष अनुराग है। संदेह, दृष्टांत, उल्लेख, अर्थांतरन्यास, अपहुति, विभावना, विशेषोक्ति, प्रतीप, व्यतिरेक, रूपकातिशयोक्ति, श्लेष, भ्रांतिमान्, अप्रस्तुत, प्रशंसा आदि के सुंदर प्रयोग तुलसीदास जी के काव्य में मिलते हैं। तुलसीदास जी ने चौपाई, दोहा, सोरठा, कवित्त, सवैया, बरवै, छप्पय आदि अनेक छंदों का प्रयोग किया है।
हिंदी-साहित्य में स्थान –
वास्तव में तुलसी हिंदी साहित्य की महान् विभूति है। इन्होंने रामभक्ति की मंदाकिनी प्रवाहित करके जन-जन का जीवन कृतार्थ कर दिया। इनके साहित्य में राम गुणगान, भक्ति-भावना, समन्वय शिवम् की भावना आदि अनेक ऐसी विशेषताएं देखने को मिलती हैं, जो इन्हें महाकवि के आसन पर प्रतिष्ठित करती हैं।
यह जीवन परिचय विद्यार्थियों के लिए यहां पर खत्म हो गया है, अगर आप उनके बारे में और अधिक जानना चाहते हैं तो इसके नीचे आपको गोस्वामी तुलसीदास जी के जीवन संबंधी अन्य जानकारियां दी जा रही हैं जो आपके ज्ञान को बढ़ाने के लिए कारगर साबित होगी।
अन्य जानकारी –
गोस्वामी तुलसीदास जी का बचपन का समय -
तुलसीदास जी का जन्म संवत् 1557 में श्रावण मास में शुक्ल सप्तमी के दिन अभ्युक्त मूल नक्षत्र में हुआ। यह नक्षत्र शुभ नहीं माना जाता है। इस शंका को बढ़ाने के लिए जो घटनाएं हुई उनमें कुछ है जैसे - तुलसीदास जी जन्मते ही रोये ही नहीं अपितु उनके मुख से राम शब्द निकला। उनके शरीर का आकार भी सामान्य शिशु की तुलना में अधिक था और उसे सबसे बढ़कर उनके मुख्य में जन्म के समय ही दांतों की उपस्थिति थी। यह सब लक्षण देखकर उनके पिता किसी अमंगल की आशंका से भयभीत थे।
उनकी माता ने घबराकर, की बालक के जीवन पर कोई संकट ना आए, अपनी एक चुनियां नाम की दासी को बालक के साथ उसके ससुराल भेज दिया। विधि का विधान ही कुछ और था और वह अगले दिवस ही गोलोक वासी हो गई। चुनिया ने बालक तुलसीदास का पालन पोषण बड़े प्रेम से किया, पर जब तुलसीदास जी करीब साढे 5 वर्ष के हुए तो चुनियां शरीर छोड़ गई अनाथ बालक द्वारा द्वारा भटकने लगा इस पर माता पार्वती को दया आई और वह एक ब्राह्मणी का वेश रखकर प्रतिदिन बालक को भोजन करने लगीं।
विद्या कहां से प्राप्त की -
श्री अनन्तानन्दजी के प्रिय शिष्य श्री नरहर्यानन्दजी जो रामशैल पर निवास कर रहे थे, उन्हें भगवान शंकर से प्रेरणा प्राप्त हुई और वे बालक तुलसीदास को ढूंढ़ते हुए वहाँ पहुंचे और मिलकर उनका नाम रामबोला रखा। वे बालक को अपने साथ अयोध्या ले गए और वहाँ उनका यज्ञोपवीत संस्कार कराया। तुलसीदास जी ने जहाँ बिना सिखाए ही गायत्री मंत्र का उच्चारण कर सभी को एक बार फिर चकित कर दिया। नरहरि महाराज ने वैष्णवों के पांच संस्कार कराए और राम मंत्र से दीक्षित किया।
फिर, उनका विद्याध्ययन प्रारम्भ हो गया। तुलसीदास जी जो भी एक बार सुन लेते थे उसे वे कंठस्थ कर लेते थे। उनकी प्रखर बुद्धि की सभी प्रशंसा करते थे। फिर एक बार नरहरि महाराज उन्हें लेकर शूकर क्षेत्र सोरों पहुँचे, जहाँ उन्होंने रामावा सुनाई। और उन्हें काशी में शेषसनातन जी के पास वेदाध्ययन के लिए छोड़ गए। यहाँ तुलसीदास जी ने 15 वर्ष वेद-वेदांग का अध्ययन किया।
वैवाहिक जीवन -
उन्हीं दिनों उनका मन संसार की ओर प्रवृत हुआ और वे अपने गांव वापस आए, जहाँ आकर उन्हें ज्ञात हुआ कि उनका परिवार सब नष्ट हो चुका है। वहाँ उन्होंने अपने पिता सहित सभी पितरों का आद्ध किया और राम कथा सुना कर जीवन यापन करने लगे।
वहीं गुरुजनों के परामर्श से उन्होंने रत्नावली नामक एक सुन्दर कन्या से सम्बत 1583 में ज्येष्श्व मास की शुक्ल 13 को विवाह किया और सुखपूर्वक वैवाहिक जीवन बिताने लगे। एक दिन पत्नी के भाई के साथ मायके चले जाने पर वे उनके पीछे पीछे पहुँच गए। इससे पत्नी को बहुत रोष हुआ और उन्होंने धिक्कारते हुए कहा कि आपकी जैसी आसक्ति मेरे हाड़ मांस के शरीर में है ऐसी यदि भगवान में होती तो आपका बेड़ा पार हो जाता। यह बात तुलसीदास जी को चुभ गई और वह उसी समय वहाँ से चल दिए।
ईश्वर और संत-महात्माओं के दर्शन -
उन्होंने प्रयागराज पहुँच कर सन्यास लिया और तीर्थाटन करने लगे। इसी क्रम में, मानसरोवर में उन्हें काकभुशुण्डि जी के दर्शन हुए। तीर्थाटन के पश्चात् तुलसीदास जी काशी में रहकर राम कथा सुनाने लगे। यहीं पर उनकी एक प्रेत से भेंट हुई जिसने उन्हें हनुमान जी का पता बताया। तुलसीदास जी हनुमान जी से जब मिले तो उन्होंने भगवान राम के दर्शन की लालसा जताई और उनसे दर्शन कराने की विनती की। हनुमान जी ने उन्हें कहा कि श्री राम जी के दर्शन उन्हें चित्रकूट में होंगे। हनुमान जी का आशीष प्राप्त कर वे चित्रकूट पहुँचे।
चित्रकूट में उन्होंने रामघाट पर अपना एक स्थान तय किया और वहीं प्रभु के दर्शन के इंतजार में साधनारत हो गए। वहीं एक बार प्रदक्षिणा करते हुए मार्ग में ही रघुनाथ जी के दर्शन हुए और वे उन्हें पहचान नहीं पाए। उन्होंने घोड़े पर सवार अद्भुत छवि वाले दो राजकुमार देखे जो धनुष और बाण लिए हुए थे, तुलसीदास जी बस उन्हें देखते ही रह गए पर उन्हें पहचान न सके। हनुमान जी ने उन्हें आकर बताया कि आज आपको प्रभु श्री राम के दर्शन हुए। इस पर तुलसीदास जी बहुत दुखी हुए कि वे उन्हें पहचान न सके। तब हनुमान जी ने उन्हें ढांढस बंधाते हुए कहा कि आपको कल सुबह फिर से एक बार दर्शन होंगे।
मौनी अमावस्या के उस सुन्दर बुधवार के दिन सम्वत 1607 में भगवान राम उनके सम्मुख पुनः प्रकट हुए। इस बार वे बालक के रूप में थे। उन्होंने तुलसीदास जी से कहा, बाबा हमें चन्दन दो। पर तुलसीदास जी दर्शन में ऐसे खोए कि प्रभु की वाणी भी नहीं सुनी। तब हनुमान जी ने तुलसीदास जी की सहायता के लिए तोते के रूप में आकर एक दोहा बोला चित्रकूट के घाट पर भई संतन की भीर, तुलसीदास बन्दन धिसत तिलक देत रघुबीर।।
प्रभु श्री राम ने अपने हाथ से ही चन्दन लेकर अपने और तुलसीदास जी के गाथे पर लगाया और अंतर्ध्यान हो गए। एक बार तीर्थाटन करते हुए तुलसीदास जी प्रयाग पहुँचे। वहीं माघ मेला चल रहा था। वे वहाँ कुछ दिन रुक गए और छः दिन के बाद उन्हें एक वृक्ष के नीचे भारद्वाज और याज्ञवल्क्य मुनि के दर्शन हुए। वहाँ उस समय राम कथा हो रही थी जो तुलसीदास जी ने अपने गुरुदेव से सुकर क्षेत्र में सुनी थी। वहाँ से वे काशी आ गए और प्रह्लाद घाट पर एक ब्राह्मण के घर रहने लगे।
हनुमान जी के दर्शन व हनुमान चालीसा की रचना -
तुलसीदास जी को एक बार अकबर ने अपने दरबार में बुलवाया। तुलसीदास जी के मना करने पर जबरदस्ती उन्हें बंदी बनाकर अकबर के सामने लाया गया। अकबर ने कहा कि "सुना है तुमने मुद्दों को भी जिंदा कर दिया। हमें भी चमत्कार कर के दिखाओ"। तो तुलसीदास जी ने कहा कि "गुझे कोई चमत्कार नहीं आता, मैं तो राग नाम जपता हूँ और उस नाम में ही चमत्कार होता है"। क्रोध में आकर अकबर ने उन्हें पकड़कर जेल में डाल दिया और यहीं पर उन्होंने इनमान चालीसा लिखना आरंभ किया। प्रतिदिन एक चौपाई लिखते और चालीसवें दिन जब हनुमान चालीसा पूर्ण हुई तब हजारों बंदरों ने फतेहपुर सीकरी पर हमला कर दिया। तब अकबर के सलाहकार ने संत को छोड़ने की विनती की। जैसे ही अकबर ने तुलसीदास को मुक्त किया तो सारे बदर वापस चले गए।
विनय पत्रिका की रचना -
एक दिन कलियुग ने मानव रूप में आकर तुलसीदास जी को परेशान करना प्रारम्भ किया।। तुलसीदास जी ने रक्षा के लिए हनुमान जी को पुकारा। तब हनुमान जी ने उन्हें विनय के पद लिखने को कहा। उभी तुलसीदास जी ने एक बहुत ही सुन्दर ग्रन्थ विनय पत्रिका की रचना की और इसे भगवान के चरणों में अर्पित किया।
श्री राम जी ने उस पर अपने हस्ताक्षर किये और तुलसीदास जी को अभय किया। तुलसीदास जी ने श्री राग कथा का गान करते हुए बाकि समय काशी में ही गुजारा, और रामकथा से सम्बंधित कुल 13 ग्रन्थ लिखे। सम्वत 1680 श्रवण शुक्ल तृतीया शनिवार को अस्सीघाट पर गोस्वामी जी ने राम राम कहते हुए अपना शरीर परित्याग किया।
People also ask –
Q. तुलसीदास जी का जीवन परिचय कैसे लिखें?
Ans - तुलसीदास का जीवन परिचय लिखने के लिए उनके जन्म (लगभग 1532 ई राजापुर बांदा), माता-पिता (तुलसी, आत्माराम दुबे), बचपन के संघर्ष, रामभक्त, प्रमुख रचनाएं- (रामचरितमानस, हनुमान चालीसा, विनय पत्रिका) भक्ति काल में योगदान और निधन। लगभग 1623 ई जैसे बिंदुओं को शामिल करें। जिसमें उनका मूलनाम रामबोला और जीवन के महत्वपूर्ण पड़ाव जैसे - श्री रामलीला की शुरुआत संकट मोचन मंदिर भी बताएं। जिससे उनके समग्र साहित्यिक और धार्मिक प्रभाव दिखेगा।
Q. तुलसीदास जी का पुराना नाम क्या था?
Ans - तुलसीदास जी का पुराना नाम रामबोला शुक्ला था।
Q. कक्षा 10 में कौन-कौन से जीवन परिचय आते हैं?
Ans - कक्षा 10 की बात करें तो इसमें अति महत्वपूर्ण जीवन परिचय आते हैं जैसे - आचार्य रामचंद्र शुक्ल, राजेंद्र प्रसाद, जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत, महादेव वर्मा आदि हम आपको इन सभी जीवन परिचय इस वेबसाइट पर बहुत ही सरल भाषा में मुहैया कराएंगे
Q. तुलसीदास की कितनी रचनाएं हैं?
Ans - तुलसीदास की कुल 12 या 13 प्रमाणिक रचनाएं मानी जाती हैं। जिनमें सबसे प्रसिद्ध महाकाव्य रामचरितमानस है, और अन्य प्रमुख रचनाओं में विनय पत्रिका, दोहावली, कवितावली गीतावली, जानकी मंगल, पार्वती मंगल और हनुमान चालीसा शामिल है। हालांकि कुछ स्रोत 13 और कुछ 14 तक कृतियों का उल्लेख करते हैं, लेकिन आमतौर पर 12 मुख्य ग्रंथों को मान्यता दी जाती है।
Q. तुलसी जी का जन्म और मृत्यु कब हुई थी?
Ans - तुलसीदास का जन्म अनुमानित रूप से 1532 ईस्वी (संवत् 1589 में) उत्तर प्रदेश के राजपुर गांव में हुआ था। और उनकी मृत्यु 1623 ई (संवत् 1680 में) काशी वाराणसी में हुई थी। जो हिंदी साहित्य के महानतम कवियों में से एक है, और रामचरितमानस के लिए जाने जाते हैं।
Q. क्या तुलसीदास 32 दांतों के साथ पैदा हुए थे?
Ans - अन्य शिशुओं के विपरीत व अपनी मां के गर्भ में 12 महीने तक रहे और जन्म के समय उनके 32 दांत थे और वह 5 साल के लड़के जैसे दिखते थे ऐसा माना जाता है की जन्म के तुरंत बाद वह रोने के बजाय उनके मुख से राम नाम याद किया आधार सबसे पहले उन्होंने राम शब्द बोला।
Q. तुलसीदास के कितने बच्चे थे?
Ans - तुलसीदास जी का तारक नाम का एक पुत्र था जो बचपन में ही मर गया था।
Q. तुलसीदास ने रामचरितमानस कहां लिखा था?
Ans - रामचरितमानस की रचना अयोध्या, वाराणसी और चित्रकूट में हुई थी।
Q. तुलसी के पिता कौन थे?
Ans - तुलसीदास जी के पिता का नाम आत्माराम दुबे था


