नमस्ते दोस्तों! क्या आप भी स्कूल या कॉलेज के छात्र हैं और हिंदी साहित्य के इतिहास में आने वाले द्विवेदी युग के बारे में बिल्कुल आसान सरल और मजेदार भाषा में जानना चाहते हैं अगर हां, तो आप बिल्कुल सही जगह पर आए हैं।
अक्सर जब हम किताबों में हिंदी साहित्य के इतिहास को पढ़ते हैं तो हमें बड़े-बड़े और मुश्किल शब्द देखकर डर लगने लगता है लेकिन चिंता मत कीजिए। आज हम इस लेख में द्विवेदी युग को इतनी आसान तरीके से समझेंगे कि जैसे कोई मजेदार कहानी पढ़ रहे हो। एक छोटे बच्चे या नए छात्र को भी यह एक बार में समझ आ जाएगा, तो आइए कॉपी पेन उठाइए और हमारे साथ इस सफर पर निकालिए।
द्विवेदी युग किसे कहते हैं? (परिभाषा)
सबसे पहले यह जानते हैं कि इस युग का नाम द्विवेदी युग क्यों पड़ा
हिंदी साहित्य के इतिहास में सन 1900 से लेकर 1918 तक के समय को द्विवेदी युग कहा जाता है।
अब आपके मन में सवाल आएगा कि क्या इस युग का नाम किसी द्विज या दो वेदों के नाम पर है?
नहीं भाई! इस युग का नाम एक महान और हिंदी के सबसे बड़े सुधारक महावीर प्रसाद द्विवेदी जी के नाम पर रखा गया है।
महावीर प्रसाद द्विवेदी जी ने साल 1903 में सरस्वती नाम की प्रसिद्ध पत्रिका की कमान संभाली और हिंदी भाषा व साहित्य को सुधारने का बेड़ा उठाया। उन्होंने उस समय के सभी लेखकों और कवियों को सिखाया की शुद्ध हिंदी कैसे लिखनी चाहिए व्याकरण की गलतियां कैसे सुधारनी चाहिए और समाज की भलाई को कैसे लिखना चाहिए उनके इसी महान योगदान के कारण इस पूरे कल को द्विवेदी युग कहा जाने लगा।
द्विवेदी युग की शुरुआत क्यों हुई? (भारतेंदु युग के बाद की कहानी)
इसे एक छोटी सी कहानी से समझे द्विवेदी युग से पहले हिंदी साहित्य में भारतेंदु युग था। उस समय के लेखक जो मन में आता था वैसी भाषा में कविताएं लिख देते थे। कोई व्याकरण का पक्का नियम नहीं था, आम बोलचाल की भाषा का इस्तेमाल होता था।
लेकिन समय बदला जब महावीर प्रसाद द्विवेदी जी ने कमान संभाली, तो उन्होंने कहा — “भाइयों और बहनों अगर हमें हिंदी को आगे बढ़ाना है, तो हमें भाषा को साफ-सुथरा और व्याकरण के नियमों से बांधना पड़ेगा तुकबंदी से काम नहीं चलेगा समाज को रास्ता दिखाने वाली बातें लिखनी होगी।”
उन्होंने ब्रजभाषा की जगह खड़ी बोली हिंदी को कविताओं और कहानियों की मुख्य भाषा बनने पर जोर दिया। बस यही से हिंदी कविता और गद्य का एक नया और आधुनिक दौर शुरू हुआ जिसे हम द्विवेदी युग कहते हैं।
द्विवेदी युग की मुख्य विशेषताएं
- खड़ी बोली हिंदी का प्रयोग: इस युग की सबसे बड़ी जीत यह थी कि कवियों ने पुरानी ब्रजभाषा को छोड़कर आम बोलचार की खड़ी बोली में लिखना शुरू कर दिया। इससे कविताएं आम लोगों तक आसानी से पहुंचने लगी।
- देशभक्ति और राष्ट्र प्रेम की भावना: इस समय देश में अंग्रेजी शासन के खिलाफ आजादी की लय तेजी से जल रही थी। इसलिए द्विवेदीयुग के कवियों की रचनाओं में देश के प्रति प्यार, अपनी संस्कृति पर गर्व और राष्ट्रभक्त साफ-साफ दिखाई देती है।
- समाज सुधार की भावना: इस युग के लेखकों का मानना था कि साहित्य केवल मनोरंजन के लिए नहीं है, बल्कि समाज से छुआछूत, अंधविश्वास जाति पाति जैसी कुरीतियों को भगाने का हथियार है।
- इतिवृत्तात्मकता (कहानी नुमा वर्णन): इस काल की कविताओं में केवल कल्पना की उड़ान नहीं होती थी, बल्कि सीधी सच्ची बातें, इतिहास की कथाओं और उपदेशों का वर्णन ज्यादा होता था। इस साहित्य की भाषा में इतिवृत्तात्मकता कहते हैं- यानी सीधे और स्पष्ट अर्थों में बात कहना।
- नैतिकता और आदर्शवाद: इस युग की रचनाओं में अच्छे संस्कार, नैतिकता, बड़ों का आदर और एक आदर्श जीवन जीने की सीख दी जाती थी।
द्विवेदी युग के प्रमुख कवि और उनकी रचनाएं
महावीर प्रसाद द्विवेदी (इस युग के सूरज): काव्यमंजूषा, सुमन, अद्भुत रस आदि।
मैथिलीशरण गुप्त (राष्ट्रकवि):
इन्हें इस युग का सबसे लोकप्रिय कवि माना जाता है। महात्मा गांधी ने इन्हें राष्ट्रकवि की उपाधि दी थी। उनकी कविताएं पढ़कर देश के युवाओं में जोश भर जाता था।
- प्रसिद्ध रचनाएं- भारत भारती, साकेत, यशोदा, पंचवटी। (भारत भारती ने देश में क्रांति ला दी थी)
अयोध्यासिंह उपाध्याय हरिऔध
इन्होंने खड़ी बोली का पहला महाकाव्य लिखा था।
- प्रसिद्ध रचनाएं- प्रियप्रवास, वैदेही वनवास, चतुर्दिक।
श्रीधर पाठक
इन्होंने प्रगति प्रेम और अंग्रेजी कविताओं का हिंदी में बहुत सुंदर अनुवाद किया।
- प्रसिद्ध रचनाएं - एकांतवासी योग।
रायदेवी प्रसाद पूर्ण
- प्रसिद्ध रचनाएं - मृत्युंजय पुणेंदु
द्विवेदी युग में गद्य का विकास (कहानियां, नाटक और उपन्यास)
अभी तक हमने ज्यादातर कविताओं की बात की लेकिन क्या आप जानते हैं कि द्विवेदी युग में कहानियों और निबंधों की दुनिया में भी बड़ा धमाका हुआ था?
- निबंधों की भरमार: क्योंकि महावीर प्रसाद द्विवेदी खुद एक बहुत बड़े निबंधकार थे, इसलिए इस युग में निबंध लिखने का चलन बहुत बढ़ गया। लोग समाज, राजनीति, इतिहास और विज्ञान पर खुलकर निबंध लिखने लगे।
- रोचक कहानियां: इस युग में हिंदी में असली कहानियां की शुरुआत हुई। लोग मैगजीन में छपने वाली चटपटी और मजेदार कहानियां पढ़ने के शौकीन हो गए। किशोरी लाल गोस्वामी और चंद्रधर शर्मा जैसे लेखकों ने ऐसी शानदार कहानियां लिखी की पढ़ने वाले का मन ही न भरे।
- नाटक और उपन्यास: हालांकि इस युग में नाटक और उपन्यास थोड़े कम लिखे गए, लेकिन जितने भी लिखे गए वह समाज को सही रास्ता दिखाने वाले और मनोरंजन से भरपूर थे।
द्विवेदी युग की प्रसिद्ध पत्रिकाएं (जिन्होंने हिंदी को जिंदा रखा)
भाई अगर उसे समय पत्रिकाएं ना होती, तो शायद अच्छी हिंदी घर-घर तक पहुंच ही न पाती द्विवेदी युग को आगे बढ़ाने में इन पत्रिकाओं का सबसे बड़ा हाथ था।
- सरस्वती पत्रिका: इसके बिना द्विवेदी युग का नाम ही अधूरा है। 1903 में जब महावीर प्रसाद द्विवेदी इसके संपादक बने तो, इस मैगजीन ने पूरे देश में तहलका मचा दिया। हर नया लेखक चाहता था कि उसकी कविता या कहानी सरस्वती में छप जाए, तो वह खुद को बहुत बड़ा लेखक मानता था।
- सुदर्शन: यह भी उस समय की बहुत मशहूर पत्रिका थी जिसमें ज्ञान विज्ञान और साहित्य की बातें छपती थी।
- प्रताप और समालोचक: इन पत्रिकाओं ने भी समाज की बुराइयों को खुलकर सामने रखा और लेखकों को नई दिशा दिखाई।
द्विवेदी युग की भाषा और शैली (कैसी थी उसे समय की हिंदी?)
अब आपके मन में यह सवाल आ सकता है कि उस समय के लोग आखिर बोलते और लिखते कैसे थे? आइए इसे पॉइंट टू पॉइंट समझते हैं:
- शुद्ध और व्याकरण वाली हिंदी: महावीर प्रसाद द्विवेदी जी व्याकरण के बहुत पक्के थे, अगर किसी लेखक की कविता में मात्रा की भी गलती होती थी तो वह उसे तुरंत सुधार देते थे इसलिए इस युग की भाषा बिल्कुल शुद्ध और साफ सुथरी हो गई।
- फारसी और अंग्रेजी शब्दों का मेल: क्योंकि खड़ी बोली जनता की भाषा थी इसलिए इसमें आम बोलचाल के वे शब्द भी आसानी से ले लिए गए जो लोग रोजमर्रा की जिंदगी में बोलते थे।
- उपदेश देने वाली शैली: इस युग की ज्यादातर रचनाओं में सीधे-सीधे समाज को अच्छी बातें सीखने का अंदाज होता था। कविताएं पढ़कर ऐसा लगता था जैसे कोई बड़े बुजुर्ग हमें जीवन जीने का तरीका समझ रहे हो
द्विवेदी युग का अंत कैसे हुआ और इसके बाद क्या आया?
हर अच्छी चीज का एक वक्त होता है ठीक वैसे ही, 1918 या 1920 आते-आते द्विवेदी युग का समय पूरा होने लगा।क्यों बदला जमाना?
जब देश में आजादी की लड़ाई और तेज हो गई लोग अंग्रेजों के खिलाफ खुलकर सड़कों पर आने लगे तब केवल उपदेश देने वाली या सीधी सच्ची कविताएं लोगों के दिल को पूरी तरह संतुष्ट नहीं कर पा रही थी। अब युवा दिल कुछ नया ज्यादा जोर से भरा और प्रकृति के करीब महसूस करना चाहता था।
तभी हिंदी साहित्य में छायावादी युग की एंट्री हुई जिसमें जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, सुमित्रानंदन पंत और महादेवी वर्मा जैसे महान कवियों ने अपनी जादुई कल्पना और प्रेम सौंदर्य से हिंदी कविता को एक बिल्कुल नई ऊंचाई पर पहुंचा दिया, लेकिन याद रखिए अगर द्विवेदी युग के कवि जमीन तैयार ना करते तो छायावादी इमारत कभी खड़ी नहीं हो पाती।
द्विवेदी युग का हिंदी साहित्य में क्या महत्व है? (निष्कर्ष)
दोस्तों अगर संक्षेप में कहे तो द्विवेदी युग हिंदी साहित्य के लिए संवारने और तरसते का काल था। जिस तरह एक कच्चा हीरा खदान से निकलने के बाद जौहरी के पास जाकर चमकता है, ठीक उसी तरह हिंदी भाषा को व्याकरण के सांचे में डालकर उसे शुद्ध करने का काम द्विवेदी युग ने किया।
इस युग ने ही आगे चलकर छायावादी युग जैसी महान काव्य धारा के लिए रास्ता तैयार किया। अगर महावीर प्रसाद द्विवेदी जी और उनके साथी खड़ी बोली को मजबूत न बनाते, तो शायद आज हिंदी का यह रूप देखने को न मिलता जो हम और आप गर्व से बोलते और लिखते हैं।
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