हेलो दोस्तों क्या आप भी रहीम दास जी के जीवन परिचय को लेकर परेशान है और किताबी भाषा समझ नहीं आ रही चिंता मत कीजिए। आज हम रहीम जी के जीवन से जुड़ी हर छोटी-छोटी बात को एकदम सरल और आसान शब्दों में समझेंगे ताकि बोर्ड एग्जाम में आप पूरे नंबर ला सकें। यह केवल बोर्ड एग्जाम के लिए नहीं आपके ज्ञान को बढ़ाने के लिए भी है।
जीवन परिचय -
हिंदी साहित्य के महान कवि अब्दुर्रहीम खान-ए-खाना (रहीम) का जन्म 1556 ईस्वी में लाहौर (वर्तमान पाकिस्तान) में हुआ था। उनके पिता का नाम बैरम खान और माता का नाम सुल्तान बेगम था। बैरम खान मुगल सम्राट अकबर के संरक्षक और सेनापति थे।
जब रहीम केवल 5 वर्ष के थे तब गुजरात के पाटन नामक स्थान पर उनके पिता की हत्या कर दी गई। इसके बाद सम्राट अकबर ने बालक रहीम और उनकी माता को दिल्ली बुला लिया और रहीम के पालन पोषण तथा शिक्षा दीक्षा का पूरा प्रबंध किया। रहीम बचपन से ही अत्यंत बुद्धिमान थे उन्होंने हिंदी, संस्कृत, अरबी, फारसी और तुर्की भाषाओं में निपुणता प्राप्त कर ली।
उनकी योग्यता सूझबूझ और वीरता से प्रसन्न होकर अकबर ने इन्हें अपने नवरत्नों में शामिल किया और खान-ए-खाना की उपाधि से सम्मानित किया। रहीम जी अत्यंत दानवीर और दयालु स्वभाव के थे। अकबर की मृत्यु के पश्चात जहांगीर के शासनकाल में इन्हें कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा। जीवन के अंतिम दिनों में यह चित्रकूट चले गए और सन 1626 ईस्वी में लगभग 70 वर्ष की आयु में इनका निधन हो गया।
साहित्यिक परिचय
रहीम दास जी भक्तिकाल के एक ऐसे कवि थे जिन्होंने धर्म की सीमाओं को तोड़कर साहित्य की रचना की और मुस्लिम परिवार में जन्म लेने के बावजूद उनके मन में भगवान श्री कृष्ण के प्रति सच्चा प्रेम और अटूट श्रद्धा थी।
- नीति और व्यावहारिक सीख - रहीम जी के दोहे की सबसे बड़ी खासियत यह है कि वह जीवन की सच्चाई बयान करते हैं उन्होंने अपने जीवन में जो कुछ देखा और अनुभव किया उसे बहुत ही सरल दोहों में ढाल दिया।
- कृष्णाभक्ति - रहीम जी ने ब्रजभाषा में जाकर भगवान श्री कृष्ण की लीलाओं का बहुत ही सुंदर और माधुरी वर्णन किया है।
- उदार और मानवी की सोच - रहीम जी के साहित्य में इंसानियत, प्रेम, नम्रता और भाईचारे का संदेश मिलता है वह समाज को सही रास्ते पर चलने की सीख देते हैं।
प्रमुख रचनाएं (कृतियां)
रहीम दास जी ने कई प्रसिद्ध किताबों की रचना की, जिनमें से मुख्य रचनाएं निम्नलिखित हैं:
- रहीम सतसई - यह रहीम जी का सबसे लोकप्रिय ग्रंथ है। इसमें नीति, भक्ति और व्यवहारिक जीवन से जुड़े सैकड़ो दोहों का संग्रह है।
- मदनाष्टक - इस किताब में भगवान श्री कृष्ण की लीलाओं और उनके सुंदर रूप का वर्णन ब्रज भाषा में किया गया है।
- बरवै नायिका भेद - यह अवधी भाषा में लिखा गया एक बहुत ही सुंदर काव्य ग्रंथ है, जो हिंदी साहित्य में बहुत प्रसिद्ध है।
- रास पंचाध्यायी - इसमें से किसने की रामलीला का धार्मिक और सुंदर वर्णन किया गया है।
- नगर शोभा - इस रचना में रहीम जी ने उस समय के समाज और अलग-अलग काम करने वाले लोगों के जीवन को दिखाया है।
भाषा शैली -
- भाषा - रहीम जी ने अपने काव्या में मुख्य रूप से ब्रजभाषा और अवधी भाषा का प्रयोग किया है। उनकी भाषा में कोई कठिन किताबी शब्द नहीं है, बल्कि यह आम बोलचाल की भाषा लगती है।
- शैली - इन्होंने मुक्तक की शैली का प्रयोग किया है, उनके दोहे सीधे दिल में उतर जाते हैं और एक बार पढ़ने पर याद हो जाते हैं।
- छंद - रहीम जी ने मुख्य रूप से दोहा, सोरठा और बरवै छंदों में अपनी रचनाएं लिखी हैं।
परीक्षा के लिए प्रसिद्ध दुआ और उसका अर्थ -
“रहिमन देखि बड़ेन को, लघु न दीजिए डारि।”
“जहां काम आवै सुई, कहा करें तलवारी ।।”
रहीम जी कहते हैं कि किसी बड़े या अमीर इंसान को देखकर अपने छोटे या गरीब दोस्तों को भूलना नहीं चाहिए और ना ही उनका आदर काम करना चाहिए क्योंकि जहां कपड़े सिलने के लिए छोटी सी सुई काम आती है वहां बड़ी तलवार किसी काम की नहीं होती है।
हिंदी साहित्य में स्थान
रहीम दास जी का हिंदी साहित्य में बहुत ऊंचा और विशेष स्थान है। एक मुस्लिम कवि होकर भी भारतीय संस्कृति, हिंदू धर्मग्रंथो और नीति का इतना गहरा ज्ञान रखना उनकी महानता को दिखाता है। उनके नीति के दोहे आज भी हर इंसान को सही रास्ते पर चलने की सीख देते हैं।
मृत्यु -
सम्राट अकबर की मृत्यु के बाद जब उनका बेटा जहांगीर दिल्ली की गद्दी पर बैठा, तो राजनीतिक मतभेदों के कारण रहीम जी का समय बहुत कठिन हो गया। जहांगीर ने रहीम जी की संपत्ति जप्त कर ली। जिससे उन्हें अपने अंतिम दिनों में काफी ग़रीबी और कष्ट खेलना पड़ा। जीवन के अंतिम समय में रहीम जी चित्रकूट चले गए और वहां भगवान की भक्ति में अपना समय बिताने लगे। अंततः सन 1626 ईस्वी में लगभग 70 वर्ष की आयु में आगरा में इस महान कवि और दानवीर का निधन हो गया।


