गोस्वामी तुलसीदास जी हिंदी साहित्य के एक ऐसे महान कवि हैं, जिन्हें बच्चा-बच्चा जानता है। उनके द्वारा लिखी गई श्री रामचरितमानस आज भारत के लगभग हर घर में पढ़ी जाती है, लेकिन क्या आप जानते हैं की जन्म लेते ही उनके माता-पिता ने उन्हें क्यों त्याग दिया था और कैसे एक आम इंसान भगवान राम का सबसे बड़ा भक्त बन गया?
इस आर्टिकल में हम तुलसीदास जी का जीवन परिचय, उनकी प्रमुख रचनाएं, साहित्यिक परिचय और भाषा शैली को एकदम आसान शब्दों में समझेंगे ताकि आपको एग्जाम में पूरे नंबर मिल सकें।
तुलसीदास का जीवन परिचय एक नजर में -
गोस्वामी तुलसीदास जी का जीवन परिचय -
हिंदी साहित्य के आकाश में कई बड़े-बड़े कवि हुए हैं, लेकिन गोस्वामी तुलसीदास जी उस चंद्रमा की तरह हैं, जिनकी भक्ति और रचनाओं की चांदनी से पूरा देश रोशन है। तुलसीदास जी को हिंदी साहित्य का सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। उन्होंने ही दुनिया के सबसे पवित्र और प्रसिद्ध ग्रंथोँ में से एक ‘श्री रामचरितमानस’ की रचना की थी।
आइए, भगवान श्री राम के परम भक्त और महान कवि गोस्वामी तुलसीदास जी के जीवन को बहुत ही आसान, सुंदर और सरल भाषा में समझते हैं।
जीवन परिचय ( Life Sketch) -
तुलसीदास जी का जन्म कब और कहां हुआ, इसे लेकर इतिहासकार और विद्वान एक मत नहीं है। लेकिन ज्यादातर विद्वानों के अनुसार उनका जन्म सन् 1532 ( (संवत् 1589) में हुआ था।
- जन्म स्थान - ज्यादातर विद्वान मानते हैं कि उनका जन्म उत्तर प्रदेश के बांदा जिले के ‘राजपुर’ नाम के गांव में हुआ था। वहीं कुछ अन्य विद्वान का जन्म स्थान एटा जिले के सोरो नामक स्थान को मानते हैं।
- माता-पिता और बचपन का नाम - तुलसीदास जी के पिता का नाम पंडित आत्माराम दुबे और माता का नाम हुलसी था। जब तुलसीदास जी का जन्म हुआ, तो वे रोए नहीं, बल्कि उनके मुख से सबसे पहले शब्द निकला–’राम’। इसी कारण उनके बचपन का नाम ‘ ‘रामबोला’ पड़ा।
- बचपन का संघर्ष - तुलसीदास जी का जन्म ‘अभुक्त मूल नक्षत्र’ में हुआ था। जन्म लेते ही उनके मुंख में 32 दांत थे और वे दिखने में समान्य बच्चों से बड़े लग रहे थे। किसी अनिष्ट की आशंका से डरकर उनके माता-पिता ने उन्हें त्याग दिया। उनका पालन-पोषण ‘मुनिया’ नाम की एक दासी ने किया। लेकिन जब रामबोला केवल 5 वर्ष के थे, तब मुनिया का भी देहांत हो गया। इसके बाद वे अनाथ हो गए और द्वार-द्वार जाकर भीख मांगकर अपना पेट पालने लगे।
- गुरु मिलन और शिक्षा - रामबोला की इस दुर्दशा को देखकर भगवान की कृपा से उन्हें बाबा नरहरिदास मिले। नरहरिदास जी ने रामबोला को अपना शिष्य बना लिया, उनका नाम ‘तुलसीदास’ रखा और उन्हें अयोध्या ले आए। वहां उन्हें राम-कथा सुनाई। इसके बाद तुलसीदास जी ने काशी जाकर शेषसनातन जी से वेद, पुराण, उपनिषद और शास्त्रों का गहरा ज्ञान प्राप्त किया।
- विवाह और जीवन का सबसे बड़ा मोड़ - तुलसीदास जी का विवाह रत्नावली नाम की एक बहुत ही सुंदर कन्या से हुआ। तुलसीदास जी अपनी पत्नी रत्नावली से बहुत गहरा प्रेम करते थे। एक बार रत्नावली अपने मायके चली गई। तुलसीदास जी उनके बिना रह नहीं पाए और उफनती नदी को पार करके, रात के अंधेरे में अपनी पत्नी से मिलने उनके मायके पहुंच गए।
इस पर रत्नावली ने बहुत लज्जित होकर एक प्रसिद्ध दोहा कहा –
‘अस्थि चर्म मय देह यह, तासों जैसी प्रीति।
नेकु जो होती राम महॅं, तो न होत भव भीति।।’’
अर्थ - जितना प्रेम तुम मेरे इस चमड़े और हड्डियों के शरीर से करते हो, अगर इसका आधा प्रेम भी तुम भगवान श्री राम से करते, तो तुम्हारा कल्याण हो जाता और तुम इस संसार के दुखों से तर जाते। यह बात तुलसीदास जी के दिल में तीर की तरह चुभ गई। उसी समय उनके मन में वैराग्य जाग उठा। उन्होंने गृहस्थ जीवन छोड़ दिया और अपना पूरा जीवन भगवान श्री राम की भक्ति में समर्पित कर दिया।
साहित्यिक परिचय (Literary Profile) -
तुलसीदास जी हिंदी साहित्य के भक्ति काल की सगुण भक्ति धारा की रामभक्ति शाखा के सबसे महान और प्रतिनिधि कवि हैं। वे केवल एक कवि ही नहीं, बल्कि एक समाज सुधारक, महान लोकनायक और मार्गदर्शक भी थे।
- भक्ति का स्वरूप - तुलसीदास जी की भक्ति मुख्य रूप से ‘दास्य भाव’ की थी। वे भगवान श्री राम को अपना स्वामी और स्वयं को उनका दासी या सेवक मानते थे।
- लोकनायक कवि - तुलसीदास जी ने अपनी रचनाओं के माध्यम से समाज को एक सही दिशा दी। उन्होंने राजा और प्रजा, माता और पुत्र, भाई और भाई, पति और पत्नी तथा गुरु और शिष्य के बीच कैसा संबंध होना चाहिए, इसका सर्वोत्तम उदाहरण ‘श्री रामचरितमानस’ में प्रस्तुत किया।
- समन्वय की भावना - तुलसीदास जी के समय समाज में ज्ञान और भक्ति, शिव और विष्णु, तथा ऊंच-नीच के नाम पर बहुत भेदभाव था। तुलसीदास जी ने अपनी कविताओं के जरिए इन सभी को एक साथ जोड़ा। उन्होंने दिखाया कि राम जी की कृपा पाने के लिए ज्ञान और भक्ति दोनों जरूरी है और भगवान के दरबार में कोई छोटा या बड़ा नहीं होता।
प्रमुख रचनाएं -
तुलसीदास जी द्वारा लिखे गए 12 छोटे बड़े ग्रंथ सबसे ज्यादा प्रामाणिक और प्रसिद्ध माने जाते हैं। इन्हें दो भागों में बांटा जा सकता है:-
बड़े ग्रंथ (Major Works):
1. श्री रामचरितमानस - यह तुलसीदास जी की कीर्ति का सबसे बड़ा आधार है। यह अवधि भाषा में लिखा गया एक महाकाव्य है, जिसमें 7 कांड (बालकांड, अयोध्याकाण्ड, अरण्यकाण्ड, किष्किन्धाकाण्ड, सुन्दरकाण्ड, लंकाकाण्ड और उत्तरकाण्ड) हैं। इसमें श्री राम का पूरा जीवन चरित्र लिखा गया है।
2. विनय पत्रिका - यह ब्रजभाषा में रचित एक बहुत ही सुंदर प्रार्थना-पत्र है, जिसमें तुलसीदास जी ने भगवान राम के दरबार में अपनी अर्जी लगाई है।
3. कवितावली - इसमें कवित्त और सवैया छंदों में रामकथा का वर्णन किया गया है।
4. दोहावली - इसमें नीति, भक्ति और राम-नाम की महिमा पर सैकड़ो सुंदर दोहे लिखे गए हैं।
5. गीतावली - इसमें संगीत के पदों में राम कथा का मधुर गायन किया गया है।
छोटे ग्रंथ (Minor Works):
6. हनुमान बाहुक - जब तुलसीदास जी की बाहों में भयानक दर्द हुआ, तो उन्होंने हनुमान जी की स्तुति में यह ग्रंथ लिखा।
7. जानकी-मंगल - इसमें श्री राम और सीता जी के विवाह पर सुंदर वर्णन है।
8. पार्वती-मंगल - इसमें भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह की कथा है।
9. रामलला नहछू - यह लोकगीतों की शैली में लिखा गया छोटा सा ग्रंथ है।
10. वैराग्य-संदीपनी - इसमें संत महात्माओं के लक्षण और वैराग्य का वर्णन है।
11. रामाज्ञा-प्रश्न - यह ज्योतिष पर आधारित एक ग्रंथ है।
12. बरवै रामायण - इसमें ‘बरवै’ छंद में संक्षिप्त राम कथा लिखी गई है।
भाषा-शैली (Language Style) -
- भाषा - तुलसीदास जी को भाषाओं का अद्भुत ज्ञान था। उन्होंने अपने समय की दो सबसे प्रमुख भाषाओं -अवधि और ब्रजभाषा-दोनों पर समान अधिकार के साथ लिखा।
- ‘श्री रामचरितमानस’ की भाषा सरस और मीठी अवधि है, जबकि ‘विनय-पत्रिका’ और ‘कवितावली’ की भाषा शुद्ध ब्रजभाषा है।
- शैली - उन्होंने उस समय प्रचलित सभी काव्य-शैलियों का उपयोग किया-
- प्रबंध शैली (जैसे श्रीरामचरितमानस)
- मुक्तक शैली (जैसे दोहावली)
- गीत शैली (जैसे गीतावली और विनय-पत्रिका)
- छंद और अलंकार - तुलसीदास जी ने दोहा, चौपाई, सोरठा, कवित्त और सवैया छंदों का मुख्य रूप से प्रयोग किया। इसके साथ ही रूपक, उपमा उत्प्रेक्षा और अनुप्रास अलंकारों का बहुत ही स्वाभाविक उपयोग किया है।
मृत्यु (Death) -
जीवन भर भगवान श्री राम की भक्ति का प्रचार करने और लोगों को सन्मार्ग दिखाने के बाद तुलसीदास जी ने अपना अंतिम समय पवित्र नगरी काशी (वाराणसी) में बिताया।
सन 1623 (संवत 1680) में काशी के ‘असीघाट’ पर तुलसीदास जी ने अपना शरीर त्याग दिया। उनकी मृत्यु के बारे में एक बहुत प्रसिद्ध दोहा कहा जाता है।
‘’संवत सोरह सै असी, असी गंग के तीर।
श्रावण शुक्ल सप्तमी, तुलसी तज्यो शरीर।।’’
हिंदी साहित्य में स्थान (Place in Hindi Literature) -
तुलसीदास जी हिंदी साहित्य के सर्वश्रेष्ठ कवि माने जाते हैं। उन्होंने न केवल हिंदी भाषा को समृद्ध किया, बल्कि भारतीय संस्कृति और समाज को भी एक नया जीवन दिया। उनका ‘श्री रामचरितमानस’ आज भी भारत के लगभग हर घर में पढ़ा जाता है।
उनकी इसी महानता के कारण विद्वानों ने कहा है:
“सूर सूर तुलसी ससी, उडगन केशवदास।
अब के कवि खद्योत सम, जहं तहं करत प्रकास।”
अर्थ - हिंदी साहित्य के आकाश में सूरदास जी सूर्य हैं, तो तुलसीदास जी चंद्रमा है। वे हिंदी साहित्य के अमर रत्न है जो युगों-युगों तक प्रासंगिक रहेंगे।
तुलसीदास जी के बारे में कुछ अन्य महत्वपूर्ण बातें (Extra Insights) -
1. हनुमान जी से मुलाकात की कथा
कहा जाता है कि तुलसीदास जी जब काशी में राम कथा सुनाते थे, तो एक वृद्ध ब्राह्मण के रूप में हनुमान जी रोज कथा सुनने आते थे। तुलसीदास जी ने उन्हें पहचान लिया और उनके पैर पकड़ लिए। जब तुलसीदास जी ने राम दर्शन की इच्छा जताई, तो हनुमान जी ने उन्हें चित्रकूट जाने की सलाह दी।
2. चित्रकूट में श्री राम और लक्ष्मण के दर्शन
चित्रकूट के घाट पर तुलसीदास जी चंदन घिस रहे थे। तभी बालक के रूप में भगवान श्री राम और लक्ष्मण जी वहां आए और उनसे तिलक लगाने को कहा। तुलसीदास जी भगवान के रूप को देखते ही रहे गए। तब हनुमान जी ने पक्षी का रूप धारण करके एक प्रसिद्ध दोहा बोला ताकि तुलसीदास जी भगवान को पहचान सके।
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