मुंशी प्रेमचंद का जीवन परिचय, साहित्यिक परिचय एवं रचनाएं | Munshi Premchand ka jivan Parichay

नमस्कार दोस्तों अगर आप कक्षा 10 और कक्षा 12 बोर्ड परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं तो मुंशी प्रेमचंद जी का जीवन परिचय आपके लिए बेहद महत्वपूर्ण है। आप किसी भी कक्षा में क्यों ना हो यह जीवन परिचय सभी के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। प्रेमचंद जी को हिंदी साहित्य का उपन्यास सम्राट कहा जाता है। आज के इस आर्टिकल में हम उनके जीवन साहित्यिक सफर और प्रमुख रचनाओं को बहुत ही सरल भाषा में समझेंगे ताकि परीक्षा में आप पूरे नंबर ला सकें।


Munshi Premchand ka jivan Parichay class 12th - biography of Munshi Premchand in Hindi

हिंदी साहित्य के महान उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद का नाम कौन नहीं जानता यदि आप कक्षा 10 या कक्षा 12 बोर्ड परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं तो प्रेमचंद जी का जीवन परिचय आपके लिए बेहद महत्वपूर्ण है। 


प्रेमचंद जी ने अपनी कहानियों और उपन्यासों में गरीब किसानों,मजदूरों और आम जनता के दुख-दर्द को इतने करीब से दिखाया है, कि उनकी रचनाएं आज भी सीधे दिल को छू लेती हैं। आइए, बोर्ड परीक्षा के दृष्टिकोण से मुंशी प्रेमचंद जी का जीवन और साहित्यिक सफर बिल्कुल सरल और आसान भाषा में समझते हैं।


मुंशी प्रेमचंद : एक नजर में - 


नाम

धनपत राय श्रीवास्तव (प्रेमचंद)

जन्म एवं जन्म स्थान

31 जुलाई1880, लम्ही गांव (वाराणसी)

माता का नाम

आनंदी देवी

पिता का नाम

अजायब राय

मुख्य उपाधि

उपन्यास सम्राट

प्रमुख रचनाएं

गोदान, गबन, सेवा सदन (उपन्यास), ईदगाह, पंच-परमेश्वर (कहानी) 

मृत्यु

8 अक्टूबर 1936 



मुंशी प्रेमचंद का जीवन परिचय (प्रारंभिक जीवन और शिक्षा) - 


मुंशी प्रेमचंद का जन्म सन 31 जुलाई 1880 को उत्तर प्रदेश के वाराणसी शहर के पास स्थित लम्ही नाम के एक छोटे से गांव में हुआ था। उनके बचपन का नाम धनपत राय श्रीवास्तव था। इनके पिता का नाम अजायब राय था, जो डाकघर में एक मामूली क्लर्क का काम करते थे। उनकी माता का नाम आनंदी देवी था। जो एक बहुत ही सरल और दयालु स्वभाव की महिला थी।


प्रेमचंद जी का शुरुआती जीवन बहुत ही दुखों और संघर्षों से भरा रहा। जब वह केवल 7 वर्ष के थे तब उनकी माता का निधन हो गया और जब वह 15 वर्ष के हुए तब उनके पिता भी इस दुनिया से चले गए। छोटी सी उम्र में ही पूरे परिवार की जिम्मेदारी प्रेमचंद जी के कंधों पर आ गई। 


तंगहारी और गरीबी के बावजूद उन्होंने अपनी पढ़ाई जारी रखी। उन्होंने ट्यूशन पढ़ा पढ़कर अपने विषम परिस्थितियों से जुड़ते हुए मैट्रिक और बीए की परीक्षा पास की। पढ़ाई पूरी करने के बाद में शिक्षा विभाग में सरकारी शिक्षक के पद पर काम करने लगे।


साहित्यिक परिचय और देश सेवा - 


प्रेमचंद की बचपन से ही पढ़ने लिखने के शौकीन थे। शुरुआती दिनों में वह नवाब राय के नाम से उर्दू भाषा में कहानी और लेख लिखा करते थे। उनकी देशभक्ति से भरी कहानियों का पहला संग्रह सोजे वतन नाम से प्रकाशित हुआ था, लेकिन उस समय भारत में अंग्रेजों का शासन था। अंग्रेजों को इस किताब में क्रांति की खुशबू आई इसलिए उन्होंने इस किताब पर रोक लगा दी और उनकी सभी कॉपियां जला दी।


अंग्रेजों की बंदिशें के बाद उन्होंने अपना नाम बदलकर प्रेमचंद रख लिया और हिंदी भाषा में लिखना शुरू कर दिया। 


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जब महात्मा गांधी ने देश में असहयोग आंदोलन की शुरुआत की, तो गांधी जी के विचारों से प्रभावित होकर प्रेमचंद जी ने अपनी अच्छी भली सरकारी नौकरी से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद में पूरी तरह से देश सेवा और साहित्य लेखन में जुट गए। उन्होंने हंस, मर्यादा, जागरण और माधुरी जैसी प्रसिद्ध पत्रिकाओं का संपादन भी किया। 


मुंशी प्रेमचंद का जीवन परिचय - मुंशी प्रेमचंद का जीवन परिचय और साहित्यिक परिचय एवं रचनाएं

मुंशी प्रेमचंद की प्रमुख रचनाएं - 


प्रेमचंद जी ने अपने जीवन काल में लगभग 300 से भी अधिक कहानियां, एक दर्जन से ज्यादा महान उपन्यास और कई नाटक लिखे। उनके प्रमुख रचनाओं का विवरण नीचे दिया गया है: 


प्रमुख उपन्यास: 

  • गोदान - यह उनका सबसे प्रसिद्ध और महान उपन्यास है, जिसमें भारतीय किसान के संघर्ष को दिखाया गया है। 

  • गबन - इसमें मध्यम वर्ग की महिलाओं में गहनों के प्रति लगाव और उसके दुष्परिणामों को दिखाया गया है।

  • सेवासदन, रंगभूमि, कर्मभूमि, निर्मला प्रेमाश्रय, कायाकल्प आदि उनके अन्य लोकप्रिय उपन्यास हैं। लेकिन उनका अंतिम उपन्यास मंगलसूत्र था जो उनके निधन के कारण अधूरा रह गया था।

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प्रसिद्ध कहानी - प्रेमचंद जी की सभी कहानियां मानसरोवर नाम के आठ भागों में संकलित है। उनकी कुछ सच्चे लोकप्रिय कहानी है:

  • ईदगाह, दो बैलों की कथा, पंच परमेश्वर, पूस की रात, कफन, बड़े घर की बेटी। 

  • नाटक - कर्बला, संग्राम, प्रेम की वेदी
  • निबंध संग्रह - कुछ विचार।

भाषा शैली और लेखन की विशेषताएं - 


प्रेमचंद जी के लेखन की सबसे बड़ी ताकत उनकी सरल और व्यावहारिक भाषा थी। वे जानते थे कि अपनी बात को आम जनता तक कैसे पहुंचा जाए। 


भाषा - प्रेमचंद जी ने अपनी रचनाओं में किसी कठिन या भारी भरकम शब्द का प्रयोग नहीं किया। उनकी भाषा एकदम व्यावहारिक है, जिसमें हिंदी के साथ-साथ उर्दू, आम बोलचाल के देहाती शब्द और अंग्रेजी के प्रचलित शब्दों का बहुत ही सुंदर मिश्रण मिलता है।


शैली - उनकी लिखने की शैली बहुत ही रोचक और जीवंत है। वे मुख रूप से वर्णनात्मक, व्यंगात्मक और भावनात्मक शैली का प्रयोग करते थे। उनकी कहानियों में मुहावरे और कहावतें का इतना सुंदर प्रयोग होता है कि पढ़ते समय पाठक बिल्कुल मंत्रमुक्त हो जाता है।


हिंदी साहित्य में स्थान और मृत्यु - 


जीवनभर गरीबी, अभावो और बीमारियों से लड़ते हुए इस महान लेखक का 8 अक्टूबर 1936 में निधन हो गया।


हिंदी साहित्यमें स्थान - मुंशी प्रेमचंद हिंदी साहित्य के इतिहास में युग प्रवर्तक कलाकार माने जाते हैं। उन्होंने हिंदी कहानी और उपन्यास को महलों और राजा रानियां की काल्पनिक दुनिया से निकालकर गांव की मिट्टी, झोपड़ियां और गरीब किसानों के असली जीवन से जोड़ा। बंगाल के महान साहित्यकार शराचंद्र चट्टोपाध्याय ने प्रेमचंद जी को उपन्यास सम्राट की उपाधि दी। आज भी जब भी हिंदी कथा साहित्य का जिक्र होता है तो मुंशी प्रेमचंद जी का नाम सबसे पहले और सबसे सम्मान के साथ लिया जाता है।


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