बिहारी लाल का जीवन परिचय | Bihari Lal Ka Jivan Parichay - Gyanmukh

क्या आप जानते हैं रीतिकाल के महान कवि बिहारी लाल जी ने अपने जीवन मे केवल एक ही किताब लिखी थी, लेकिन उस एक ही किताब ने उन्हें पूरी दुनिया में अमर बना दिया। इतना ही नहीं उनकी चतुराई और केवल दो लाइन की एक कविता ने एक राजा को ऐसा बदला की खुश होकर राजा उन्हें हर दोहे पर सोने का एक सिक्का देने लगे थे!


कवि बिहारी जी अपनी बातों को बहुत कम शब्दों में खाने के लिए जाने जाते हैं अगर आप बिहारी लाल जी के बारे में जानना चाहते हैं। उनका जीवन परिचय, साहित्यिक परिचय, रचनाएं और भाषा शैली तो यह आर्टिकल विशेष आपके लिए ही तैयार किया गया है आइए उनके जीवन को एकदम सरल शब्दों में जानते हैं।


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कवि बिहारी लाल का जीवन परिचय एक नजर में - 


पूरा नाम

कवि बिहारीलाल

जन्म

सन् 1595 (ग्वालियर, मध्य प्रदेश)

पिता का नाम

पंडित केशव राय

मुख्य आश्रयदाता

जयपुर के राजा मिर्जा राजा जयसिंह 

एकमात्र प्रसिद्ध ग्रंथ

बिहारी सतसई (कुल 719 दोहे)

काव्य धारा व भाषा

रीतिकाल की रीतिसिद्ध धारा (साहित्यिक ब्रजभाषा) 

मृत्यु

सन 1663 के आसपास



रीतिकाल के महान कवि बिहारी लाल जी का जीवन परिचय - 

हिंदी साहित्य के रीतिकाल में वैसे तो कई प्रसिद्ध कवि हुए, लेकिन कविराज बिहारी लाल जी उसे चमकते हुए हीरे की तरह हैं, जिनकी तुलना किसी और से नहीं की जा सकती। उन्होंने गागर में सागर भरते हुए केवल एक ही ग्रंथ लिखा और हिंदी साहित्य में हमेशा हमेशा के लिए अमर हो गए।


आइए, रीतिकाल के इस महान कवि बिहारी लाल जी के जीवन को बहुत ही आसान, सुंदर और सरल भाषा में समझते हैं।


जीवन परिचय (Life Sketch) - 

कवि बिहारी लाल जी के जन्म और शुरुआती जीवन के बारे में विद्वानों के बीच थोड़ा बहुत मतभेद है, लेकिन प्रमाणिक विवरणों के अनुसार उनका जन्म सन् 1595 (संवत 1652) के आसपास माना जाता है।

  • जन्म स्थान: बिहारी जी का जन्म मध्य प्रदेश के ‘ग्वालियर’ जिले के ‘बासुआ गोविंदपुर’ नामक गांव में हुआ था।

  • बचपन और पिता: इनके पिता का नाम केशव राय था। बिहारी जी का बचपन ग्वालियर में ही बीता। जब वे थोड़े बड़े हुए, तो अपने पिता के साथ राजस्थान के ओरछा राज्य में आ गए। इनके जन्म और बचपन के बारे में एक प्रसिद्ध दोहा भी कहा जाता है:

“प्रगट भय द्विजराज कुल, सुबस बसे ब्रज आइ।

मेरो हरौ कलेश सब, केसव केसवराइ।।”

  • ससुराल और मथुरा वास: बिहारी जी का विवाह मथुरा के एक संभ्रांत ब्राह्मण परिवार में हुआ था। शादी के बाद वे कुछ समय तक अपने ससुराल में ही रहे।

  • जयपुर दरबार और राजा जयसिंह मिलन: बिहारी जी के जीवन का सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब वे जयपुर के राजा मिर्जा राजा जयसिंह के दरबार में पहुंचे। उसे समय राजा जयसिंह अपनी नई रानी के प्रेम में इतने डूबे हुए थे कि वे राज-काज पूरी तरह भूल चुके थे और अपने महल से बाहर ही नहीं निकलते थे। प्रजा बहुत दुखी थी और दरबारियों में किसी की हिम्मत नहीं थी की राजा को समझ सके।


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तब बिहारी जी ने एक बहुत ही चतुर और अर्थपूर्ण दोहा लिखकर किसी तरह राजा के पास अंदर भिजवाया:


“नहिं परागु नहिं मधुर मधु, नहिं विकासु इहिं काल।

अली कली ही सौं बंध्यौ, आगे कौन हवाल।।”


अर्थ: अभी तो यह कली ही पूरी तरह खिली नहीं है और न ही इसमें रस है, फिर भी भौरा (राजा) इसी में अटका हुआ है, जब यह कली पूरी तरह फुल बनेगी, तब राजा का क्या हाल होगा?


इस दोहे का अर्थ समझते ही राजा जयसिंह की आंखों से अज्ञान का पर्दा हट गया। वे तुरंत महल से बाहर आए और फिर से राज-काज संभालने लगे। राजा जयसिंह बिहारी जी की इस बुद्धिमत्ता और काव्य-कला से इतनी खुश हुए की उन्होंने बिहारी जी को अपने दरबार में सम्मानित कवि बना लिया और ऐलान किया कि बिहारी जी के हर नए दोहे पर उन्हें एक सोने की मुद्रा दी जाएगी।


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साहित्यिक परिचय (Literary Profile)

कवि बिहारी लाल जी हिंदी साहित्य के रीतिकाल की ‘रीतिसिद्ध’ काव्य-धारा के सबसे प्रमुख और श्रेष्ठ कवि हैं।

गागर में सागर भरना: बिहारी जी की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि वह केवल दो पंक्तियों (दोहे) के छोटे से छंद में इतनी बड़ी और गहरी बात कह देते थे कि पढ़ने वाला हैरान रह जाता था। इसी कला को गागर में सागर भरना (कम शब्दों में बहुत अधिक बात कहना) कहा जाता है।


बहुज्ञता (हर विषय का ज्ञान): बिहारी जी को केवल कविता लिखना ही नहीं आता था, बल्कि उन्हें ज्योतिष, नीति, गणित, इतिहास, दर्शन और आयुर्वेद जैसे कई विषयों का गहरा ज्ञान था, उन्होंने अपने दोहों में इन सभी विषयों का बहुत ही सुंदर प्रयोग किया है।


त्रिवेणी संगम (भक्ति,नीति और श्रंगार): भले ही बिहारी जी मुख्य रूप से ‘श्रृंगार रस’ के कवि माने जाते हैं, लेकिन उनकी कविता में श्रृंगार, भक्ति और नीति तीनों का अद्भुत संगम देखने को मिलता है।


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प्रमुख रचनाएं (Famous Works)

बिहारी जी की महानता का सबसे बड़ा आश्चर्य है कि उन्होंने अपने पूरे जीवन में केवल एक ही ग्रंथ लिखा, और उसी एक ग्रंथ ने उन्हें हिंदी साहित्य का अमर कवि बना दिया।


 ‘बिहारी सतसई’ (Bihari Satsai)

  • यह बिहारी जी की एकमात्र और विश्वप्रसिद्ध रचना है। 

  • ‘सतसई’ शब्द का अर्थ होता है — सात सौ (700) इस ग्रंथ में कुल 719 दोहे (कुछ विद्वानों के अनुसार 713 दोहे) हैं।

  • यह ग्रंथ ब्रजभाषा का एक अमूल्य रत्न है इसमें राधा-कृष्ण के प्रेम, सौंदर्य, नीति की बातों और भक्ति भाव का मनमोहक वर्णन है।


इस ग्रंथ के बारे में विद्वानों ने एक बहुत ही प्रसिद्ध पंक्ति कही है:


 “सतसइया के दोहरे, ज्यों नावक के तीर।

देखन मे छोटे लगैं, बेधैं सकल शरीर।।”


अर्थ: बिहारी सतसई के दोहे देखने में बहुत छोटे (नावक के छोटे तीर जैसे) लगते हैं, लेकिन उनका असर दिल और दिमाग पर बहुत गहरा और अचूक होता है।


भाषा शैली (Language & Style)

  • भाषा: बिहारी जी ने अपने काव्य में शुद्ध, साहित्यिक और परिमार्जित ब्रजभाषा का प्रयोग किया है। उनकी ब्रजभाषा भाषा में पूर्वी हिंदी, बुंदेलखंडी, अरबी और फारसी भाषा के शब्दों का बहुत ही सुंदर मेल दिखता है।
  • शैली: बिहारी जी की शैली मुख्य रूप से ‘मुक्तक शैली’ है। मुक्तक का मतलब होता है कि उनका हर दोहा अपने आप में पूरा स्वतंत्र और इसका अर्थ समझने के लिए पिछले या अगले दोहे की जरूरत नहीं पड़ती।

  • रस और अलंकार: बिहारी जी के काव्य में शृंगार रस (संयोग और वियोग दोनों) की प्रधानता है। इसके अलावा उन्होंने रूपक, उत्प्रेक्षा, यमक, अनुप्रास और श्लेष अलंकारों का बहुत ही स्वाभाविक और चमत्कारी प्रयोग किया है।


मृत्यु (Death)

जयपुर के राजा जयसिंह के दरबार में रहते हुए और अपनी अनमोल रचना ‘बिहार सतसई’ को पूरा करने के बाद बिहारी जी का मन सांसारिक मोह-माया से भर गया और वे भक्ति की ओर मुड़ गए।

सन् 1663 (संवत 1720) के आसपास बिहारी जी का देहांत हो गया।


हिंदी साहित्य में स्थान (place in Hindi Literature)


हिंदी साहित्य के रीतिकाल में बिहारी जी का स्थान सर्वोपरि है। वे आद्वितीय कवि है, जिन्होंने केवल 719 दोहे लिखकर वह सफलता पाई जो बड़े-बड़े महाकाव्य लिखकर भी बहुत से कवियों को नहीं मिलती।


उनकी काव्य-कुशलता और शिल्प सौंदर्य के कारण हिंदी साहित्य के विद्वानों ने उन्हें ‘रीतिकाल का मुकुममणि’ और ‘ दोहा छंद का सम्राट’ माना है।


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बिहारी लाल जी के बारे में कुछ अन्य महत्वपूर्ण बातें (Extra Insights)


1. वियोग श्रृंगार का अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन: 


बिहारी जी ने जब नायिका (प्रेमिका( के विरह (दुख) का वर्णन किया, तो उन्होंने कल्पना की सीमा ही लांघ दी। उनका एक बहुत ही मशहूर और चुलबुला दोहा देखिए, जिसमें नायिका विरह के कारण इतनी पतली और कमजोर हो गई है कि सांस लेते समय आगे-पीछे डोलती है:


“इति आवति चलि जात उत, चले छ-सात कर हाथ।

चढ़ी हिंडोरे सी रहै, लगी डीघ उसासन साथ।।”


अर्थ: प्रेमिका जब लंबी सांस खींचती है तो तीन-चार कदम पीछे खिसक जाती है और जब सांस छोड़ती है तो तीन-चार कदम आगे चली जाती है ऐसा लगता है मानो वह सांसों के झूलों पर चढ़कर झूल रही हो।


2. नीति के अमर दोहे: 


बिहारी जी ने केवल प्रेम और श्रृंगार ही नहीं लिखा, बल्कि जीवन जीने के कई व्यावहारिक नियम (नीति) भी सिखाए। जैसे:


“कनक कनक तें सौ गुनी, मादकता अधिकाय।

वा खाए बौराय जग, या पाय बौराय।।”


अर्थ: यहां एक ‘कनक’ का अर्थ धतूरा (जहर) है और दूसरे ‘कनक’ का अर्थ सोना (धन) है बिहारी जी कहते हैं कि सोने में धतूरे से भी सौ गुना ज्यादा पागलपन होता है, क्योंकि धतूरे को तो खाने के बाद इंसान बौरात (पागल) होता है, लेकिन सोने (धन) को तो केवल पा लेने से ही इंसान घमंड में पागल हो जाता है।


3. बिहारी जी के जीवन से छात्रों को मिलने वाली सीख: 

  • मात्रा से ज्यादा गुणवत्ता जरूरी है: जैसे बिहारी जी ने सैकड़ो किताबें लिखने के बजाय केवल एक ‘बिहारी सतसई’ लिखकर इतिहास रच दिया, वैसे ही हमें भी जीवन में कम लेकिन बेहतरीन काम करने पर ध्यान देना चाहिए।

  • सटीक और प्रभावशाली बात कहना: कम शब्दों में अपनी बात को सही और प्रभावशाली ढंग से सामने रखना ही सबसे बड़ी बुद्धिमता है.

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