क्या आप किसी ऐसे छोटे बच्चों को जानते हैं जो दिन रात चेहरे पर मुस्कान रखकर सबका काम करें लेकिन फिर भी उसे प्यार के बदले सिर्फ डांट और मार मिले?
बहादुर नेपाल के एक ऐसे ही मासूम और सीधे साधे 12 साल के बच्चे की कहानी है, जो अपने घर से भाग कर शहर में नौकर बनता है यह कहानी हमें सिखाती है कि किसी गरीब और बेसहारा बच्चों का दिल दुखाने से बाद में सिर्फ पछतावा ही हाथ लगता है इसलिए इसे बहुत ही आसान भाषा में समझते हैं।
बहादुर कहानी का सारांश -
अमरकांत जी द्वारा लिखी गई बहादुर कहानी एक ऐसे छोटे बच्चों की कहानी है जो अपने घर से भाग कर शहर में एक मिडिल क्लास फैमिली में नौकर बन जाता है। यह कहानी हमें सिखाती है कि किसी गरीब और बेसहारा बच्चों के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए, और कैसे छोटी-छोटी गलतफहमियां किसी के दिल को ठेस पहुंचा सकती हैं।
आइए, इस कहानी को बिल्कुल आसान शब्दों में एक प्यारी सी कथा की तरह समझते हैं।
बहादुर कौन है और वह घर क्यों छोड़ता है?
बहादुर का पूरा नाम दिल बहादुर है। वह नेपाल का रहने वाला एक 12-13 साल का छोटा सा बच्चा है। उसके पिता युद्ध में शहीद हो चुके थे, इसलिए वह अपनी मां के साथ गांव में रहता था। बहादुर की मां बहुत सख्त और गुस्से वाली स्वभाव की महिला थी। वह बहादुर से घर और खेत का बहुत सारा काम कराती थी। बहादुर स्वभाव से थोड़ा नटखट और चंचल था, इसलिए उसकी मन काम में कम और खेलने में ज्यादा लगता था।
एक दिन की बात है। बहादुर को अपनी मां की एक प्यारी भैंस को चराने के लिए जंगल ले जाना था। जंगल में बहादुर का ध्यान खेलने में लग गया और उसने उस भैंस को बहुत मारा। भैंस भागती हुई सीधी बहादुर की मां के पास पहुंची। जब मां ने देखा कि उसकी प्यारी भैंस हांफ रही है, और डरी हुई है तो उन्हें समझ आ गया कि बहादुर ने इसे पीटा है। मां को इतना गुस्सा आया कि उन्होंने बहादुर की दुगनी पिटाई कर दी। बहादुर का दिल टूट गया वह रात भर जंगल में छुपा रहा और अगली सुबह मां के रखे पैसों में से चुपके से ₹2 निकाल कर घर से भाग गया। वह बस से सीधा शहर आ गया।
शहर आगमन और नए घर में प्रवेश -
शहर आकर बहादुर की मुलाकात निर्मला के पति से होती है। निर्मला का परिवार एक मध्यमवर्गीय परिवार है। निर्मला और उसके पति काफी समय से अपने घर के कामकाज के लिए एक नौकर की तलाश कर रहे थे क्योंकि उनके रिश्तेदारों के घर नौकर थे और वह भी अपने घर में एक नौकर रखकर थोड़ा आराम और रुतबा पाना चाहते थे। जब निर्मला के पति बहादुर को अपने घर लाये तो बहादुर का चेहरा बहुत सीधा और मासूम था उसने सिर पर गोल टोपी पहनी हुई थी। गले में रुमाल बांधा था और पांव में पुरानी चप्पलें थी।
निर्मला बहादुर को देखकर बहुत खुश हुई। उसमें बहादुर से उसका नाम पूछा तो उसने बताया दिल बहादुर। निर्मला ने प्यार से कहा आज से हम तुम्हें सिर्फ बहादुर कहेंगे। इस तरह बहादुर के नाम से दिल शब्द हटा दिया गया और वह सिर्फ बहादुर बनकर उस घर का नौकर बन गया।
बहादुर का काम और उसका हंसमुख स्वभाव -
शुरुआत में बहादुर का नये घर में बहुत स्वागत हुआ उसे घर के छोटे-छोटे सारे काम सौंप दिए गए।
- सुबह उठकर बर्तन साफ करना और पोछा लगाना।
- घर के सदस्यों के कपड़े धोना और प्रेस करना।
- बाजार से राशन और सामान लाना।
- घर के बच्चों और बड़ों की छोटी-छोटी ज़रूरतें पूरी करना।
बहादुर काम करने में बहुत फुर्तीला था। वह सुबह से लेकर रात तक बिना थके हंसते-हंसते सारा काम करता था। वह कभी किसी बात का बुरा नहीं मानता था अगर उसे कोई डांट भी देता तो वह अपनी मीठी सी मुस्कान बिखेर देता था।
रात को अपना काम खत्म करने के बाद बहादुर अपने बिस्तर पर बैठ जाता। वह अपनी जेब से शीशा, कंगी, ताश के पत्ते और लकड़ी के छोटे-छोटे खिलौने निकालता, फिर वह अपनी नेपाली भाषा में धीमे-धीमे सुरीले गाने गाता। उसे देखकर लगता था कि वह अपने घर और मां की डांट को भूलकर इस नये घर को ही अपना सब कुछ मान चुका है।
परिवार के रवैये में बदलाव: आराम की लत और कड़वाहट
शुरुआती कुछ दिन बीत जाने के बाद घर के लोगों का व्यवहार बहादुर के प्रति बदलने लगा।
क्योंकि घर में एक नौकर आ गया था इसलिए घर के सभी लोग बहुत आलसी हो गए। छोटे से छोटे काम के लिए भी बहादुर को आवाज़ लगाई जाती:
बहादुर, जरा पानी देना!
बहादुर, मेरे जूते कहां है?
बहादुर, चाय लाओ!
निर्मला जो शुरुआत में बहादुर को अपने बच्चे की तरह मानती थी, अब छोटी-छोटी बातों पर उसपर चिल्लाने लगी निर्मला का बड़ा बेटा किशोर बहुत जिद्दी और घमंडी किस्म का लड़का था। वह बहादुर से अपने निजी काम करवाता, जैसे अपने जूते साफ करवाना कपड़े धुलवाना और अपनी साइकिल साफ करवाना।
अगर बहादुर से काम में थोड़ी सी भी देरी हो जाती तो किशोर उसे गंदी-गंदी गालियां देता और उस पर हाथ भी उठा देता। बहादुर फिर भी चुपचाप सब सह लेता और किसी से कोई शिकायत नहीं करता था।
झूठा आरोप: चोरी की घटना -
एक दिन निर्मला के घर कुछ रिश्तेदार दावत पर आए। घर में सब खुश थे और बातचीत चल रही थी।
अचानक को रिश्तेदारों ने एक नई चला चली या यूं कहें की घर में एक ड्रामा शुरू हुआ रिश्तेदार महिला ने कहा अरे मेरे ₹11 जो मैंने साड़ी के पल्लू में बांधकर रखे थे भी गायब हैं!
सब जगह ढूंढा गया लेकिन रुपए नहीं मिले तब रिश्तेदारों ने बड़ी चालाकी से सारा शक बहादुर पर डाल दिया। उन्होंने कहा आजकल के नौकरों पर भरोसा नहीं किया जा सकता। जरूर इसी लड़के ने रुपए चुराए होंगे। बहादुर को बुलाया गया। बहादुर ने बड़ी मासूमियत से रोते हुए कहा मैंने रुपए नहीं लिए हैं मां जी।
लेकिन रिश्तेदारों के उकसाने पर लेखक और निर्मला को भी लगाकर बहादुर झूठ बोल रहा है। लेखक जो हमेशा बहादुर से प्यार से बात करते थे, उन्होंने भी गुस्से में आकर बहादुर को मारना पीटना शुरू कर दिया और उसे पुलिस के हवाले करने की धमकी दी। बहादुर रोता रहा गिरगाड़ता रहा और अपनी बेगुनाही की कसम खाता रहा, लेकिन किसी ने उसकी एक न सुनी और झूठे इल्जाम और अपने ऊपर हुए अत्याचार ने बहादुर के दिल पूरी तरह तोड़ दिया।
बहादुर का घर छोड़ कर चले जाना -
चोरी का झूठा आरोप लगने और अपने ईमानदारी पर चोट पहुंचने के बाद बहादुर बहुत उदास रहने लगा। अब उसका मन काम में नहीं लगता था। उससे गलतियां होने लगी।
एक दिन बर्तन साफ करते समय बहादुर के हाथ से निर्मल का एक सिलबट्टा छूटकर गिर गया और टूट गया बहादुर बहुत डर गया उसे लगा कि आज फिर उसे बहुत मारा जाएगा। बहादुर ने अब और अपमान और अत्याचार ना सहने का फैसला किया। उसने अपने पहने हुए कपड़ों के अलावा घर की कोई भी चीज नहीं छुई। यहां तक कि उसने अपनी मेहनत की कमाई के बचे हुए पैसे और अपना सामान भी वहीं छोड़ दिया। वह चुपचाप बिना किसी को बताएं बिना कोई सामान लिए घर छोड़कर चला गया।
पछतावा और दुख -
जब शाम को निर्मला और उसका परिवार घर लौटे तो उन्हें बहादुर कहीं नहीं मिला। जब उन्होंने बहादुर का कमरा देखा तो पाया कि बहादुर अपना एक भी सामान साथ नहीं ले गया था यहां तक की उसके कपड़े और जूते भी वही रखे थे।
तभी निर्मला और उसके परिवार को एहसास हुआ कि बहादुर कर नहीं था! अगर वह चोर होता तो चोरी के पैसों के साथ-साथ घर का सामान या अपना सामान लेकर जाता। उसने तो अपनी ईमानदारी और स्वाभिमान को बचाने के लिए वह घर छोड़ दिया था।
अब घर के हर कोने में बहादुर की कमी करने लगी:
- निर्मला रो-रोकर कहने लगी कि उसने एक इतने अच्छे और वफादार बच्चे पर शक किया और उसे भूखरखा।
- किशोर पछताने लगा कि उसने बहादुर को बेवजह मारा पीटा और गाली दी।
- लेखक को अपनी उस भूल पर गहरा पछतावा हो रहा था कि उन्होंने रिश्तेदारों की झूठी बातों में आकर एक मासूम बच्चे पर हाथ उठाया।
लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी बहादुर दूर जा चुका था और पीछे छोड़ गया था केवल सन्नाटा, एहसास और कभी न मिटने वाला पछतावा।
इस कहानी से हमें क्या सीख मिलती है?
- मानवता और प्रेम: हमें अपने घर में काम करने वाले नौकरों या छोटे बच्चों के साथ हमेशा प्यार, सम्मान और दया का व्यवहार करना चाहिए।
- बिना सबूत शक ना करना: किसी की मासूमियत पर बिना किसी सबूत के चोरी या गलत काम का इल्जाम नहीं लगना चाहिए।
- आत्मसम्मान: गरीब से गरीब और छोटा बच्चा भी अपने आत्मसम्मान से प्यार करता है। गली और टी इंसान का दिल तोड़ देती है।
हमारे अन्य महत्वपूर्ण लेख भी पढ़ें:
धन्यवाद! 'Gyan Mukh' परिवार का हिस्सा बनने के लिए आपका बहुत-बहुत आभार। 😊


