क्या आप जानते हैं कि बिना कोई लाठी या बंदूक उठाए भी इतनी बड़ी अंग्रेज सरकार को भारत से कैसे भगाया गया?
मुक्तियज्ञ हमारे प्यारे बापू की एक ऐसी सुंदर और सच्ची कहानी है, जिन्होने केवल सत्य और अहिंसा की ताकत से हमारे देश को अंग्रेजों की गुलामी से आजाद कराया था। आइए, इसे बिल्कुल आसान और मजेदार तरीके से समझते है।
मुक्तियज्ञ प्रसिद्ध कवि सुमित्रानंदन पंत जी का लिखा हुआ। एक बहुत ही सुंदर और प्रेरणादायक खंडकाव्य है। इस पूरी कविता में भारत की आजादी की लड़ाई और महात्मा गांधी जी के योगदान की कहानी बताई गई है।
मुक्तियज्ञ का मतलब होता है आजादी पाने के लिए किया जाने वाला महान काम। इस कहानी में दिखाया गया है कि कैसे गांधी जी ने बिना कोई हथियार उठाने केवल सत्य और अहिंसा के बल पर अंग्रेजों को भारत से बाहर भगाया और देश को आजाद कराया।
भारत की गुलामी और गांधी जी का आना -
बात उन दिनों की है जब हमारा प्यारा भारत देश अंग्रेजों का गुलाम था। अंग्रेज भारत के लोगों पर बहुत अत्याचार करते थे। उन पर तरह-तरह के गलत नियम थोपते थे, और देश का सारा धन लौटकर इंग्लैंड ले जाते थे भारत के लोग दुखी थे और आजादी पाना चाहते थे।
ऐसे ही अंधेरे समय में महात्मा गांधी जी एक रोशनी बनकर आए। गांधी जी ने देखा कि हमारे देश के लोग डरे हुए हैं और आपस में बटे हुए हैं उन्होंने ठान लिया कि वह भारत को अंग्रेजों की गुलामी से जरूर छुड़ाएंगे लेकिन उनका तरीका सबसे अलग था। उन्होंने किसी से मारपीट करने के बजाय सत्य और अहिंसा का रास्ता चुना।
साबरमती आश्रम और आजादी का संकल्प -
गांधी जी ने गुजरात में साबरमती नदी के किनारे अपना एक आश्रम बनाया जिसे साबरमती आश्रम कहा जाता है।
गांधी जी ने वहां से पूरे देश के लोगों को एक साथ जोड़ा उन्होंने लोगों को सिखाया कि :
- किसी के साथ भेदभाव मत करो। (छुआछूत मिटाओ)
- देश में बनी चीजों का इस्तेमाल करो और विदेशियों की चीजों का बहिष्कार करो।
- सूत कातो और खुद का कपड़ा पहनो यानी खादी बनाओ और खादी ही पहनो।
गांधी जी का यह आश्रम आजादी की लड़ाई का सबसे बड़ा केंद्र बन गया। देश के कोने-कोने से लोग गांधी जी की बातें सुनने और उनके साथ जुड़ने आने लगे।
नमक कानून और दांडी यात्रा (सबसे बड़ा मोड़) -
उस समय अंग्रेजों ने एक बहुत ही खराब कानून बनाया था। उन्होंने समुद्र के पानी से बनने वाले नमक पर भारी टैक्स लगा दिया था और भारतीयों के नमक बनाने पर रोक लगा दी थी। गरीब से गरीब इंसान के लिए भी नमक बहुत जरूरी चीज थी, इसलिए इस कानून से सबको बहुत तकलीफ हो रही थी।
गांधी जी ने अंग्रेजों के इस अन्यायपूर्ण कानून को तोड़ने का फैसला किया।
- 12 मार्च 1930 को गांधी जी अपने कुछ साथियों के साथ साबरमती आश्रम से पैदल ही यात्रा पर निकल पड़े।
- इस यात्रा का नाम था दांडी यात्रा।
- वे लगातार कई दिनों तक पैदल चलते रहे। रास्ते में गांव-गांव के हजारों लाखों लोग उनके साथ जुड़ते गए।
- 6 अप्रैल 1930 को गांधी जी दांडी नाम की जगह पर समुद्र किनारे पहुंचे। वहां उन्होंने समुद्र के पानी से खुद नमक बनाया और अंग्रेजों के बने कानून को तोड़ दिया।
इस घटना ने पूरे देश में एक नया जोश भर दिया। लोगों को समझ आ गया कि अब अंग्रेज सरकार से डरने की जरूरत नहीं है।
सत्याग्रह और अंग्रेजों का अत्याचार -
नमक कानून टूटने के बाद पूरे देश में सत्याग्रह और सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरू हो गया। लोग सड़कों पर उतर आए और अंग्रेजों की बात मानने से इनकार करने लगे। यह देखकर अंग्रेज सरकार घबरा गई अंग्रेजों ने आंदोलन को दबाने के लिए निहत्थे लोगों पर लाठियां बरसाई, गोलियां चलाई और हजारों देशभक्तों को जेल में डाल दिया।
लेकिन भारतीय लोग अब डरने वाले नहीं थे। जब भी गांधी जी को जेल में डाला जाता, देश के लोग और ज्यादा निडर होकर सड़कों पर आ जाते। जेल जाने वाले देशभक्तों की संख्या इतनी बढ़ गई कि अंग्रेजों की जिले भी छोटा पड़ने लगी।
समाज सुधार और एकता का संदेश -
गांधी जी जानते थे कि जब तक देश के सभी लोग एक जुट नहीं होंगे। तब तक अंग्रेजों को हराना मुश्किल है, इसलिए उन्होंने सिर्फ राजनीतिक आजादी ही नहीं मांगी बल्कि समाज की बुराइयों को भी दूर करने का काम किया:
- छुआछूत का अंत: गांधी जी ने समाज में फैले ऊंच नीच के भेदभाव को खत्म किया। उन्होंने शोषिण और पिछड़े लोगों को हरिजन नाम दिया और उन्हें सम्मान दिलाया।
- महिलाओं के हिस्सेदारी: गांधी जी के कहने पर देश की महिलाओं ने भी घर से निकलकर आजादी के आंदोलन में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया।
- हिंदू मुस्लिम एकता: गांधी जी ने हमेशा यह सिखाया कि भारत में रहने वाले सभी धर्म के लोग आपस में भाई-भाई हैं।
भारत छोड़ो आंदोलन (1942) -
समय बितता गया,लेकिन अंग्रेज आसानी से भारत छोड़ने को तैयार नहीं थे। तब सन 1942 में महात्मा गांधी जी ने अंग्रेजों के खिलाफ सबसे बड़ा आंदोलन शुरू किया। जिसका नाम था — भारत छोड़ो आंदोलन।
गांधी जी ने पूरे देश को एक बहुत ही प्रसिद्ध नारा दिया — करो या मरो।
इसका मतलब था कि या तो हम अपने देश को आजाद कराएंगे या फिर आजादी की इस लड़ाई में अपने प्राण न्योछावर कर देंगे, लेकिन अब गुलामी बर्दाश्त नहीं करेंगे। गांधी जी के इस नारे ने पूरे देश में आग की तरह काम किया। बच्चे, बूढ़े, जवान, महिलाएं हर कोई “अंग्रेजों भारत छोड़ो” के नारे लगाने लगा पूरे देश में हड़ताल हुई और अंग्रेजों का शासन थप गया।
भारत की आजादी और नया सवेरा (15 अगस्त 1947) -
भारत छोड़ो आंदोलन के बाद अंग्रेजों को अच्छी तरह समझ आ गया कि अब वह भारत पर ज्यादा दिनों तक राज नहीं कर सकते। देश का हर नागरिक अपनी आजादी के लिए जान देने को तैयार था।
आखिरकार, भारतीय देशभक्ति के लंबे संघर्ष, बलिदान और गांधी जी के अहिंसा के रास्ते के आगे अंग्रेजों को झुकना ही पड़ा।
15 अगस्त 1947 को वह ऐतिहासिक दिन आया जब हमारा भारत देश अंग्रेजों की गुलामी से पूरी तरह आजाद हो गया। सैकड़ो सालों से चला आ रहा गुलामी का अंधेरा खत्म हुआ और आजादी का एक नया और सुंदर सूरज उगा।
मुक्तियज्ञ से हमें क्या सीख मिलती है?
- सत्य और अहिंसा की ताकत: मारपीट और लड़ाई झगड़े के बिना भी बड़ी से बड़ी ताकत को हराया जा सकता है।
- एकता में शक्ति है: जब देश के सभी लोग मिलकर एक साथ खड़े होते हैं, तो कोई भी उन्हें रोक नहीं सकता।
- देशभक्ति और त्याग: हमारी आजादी बहुत मुश्किलों से और कहीं देशभक्तों के बलिदान से मिली है, इसलिए हमें अपने देश का हमेशा सम्मान करना चाहिए।
संक्षेप में कहे तो, मुक्तियज्ञ केवल एक कविता नहीं है, बल्कि यह हमारे देश की आजादी की वह महान गाथा है जो हमें हमेशा अपने भारत माता से प्यार करना सिखाती है।
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