प्रसिद्ध साहित्यकार विष्णु प्रभाकर द्वारा रचित नाटक कुहासा और किरण समाज में फैले भ्रष्टाचार, बेईमानी और देशद्रोह के खिलाफ लिखा गया। एक बहुत ही सुंदर और प्रभावशाली नाटक है।
यहां कुहासा का अर्थ है समाज में फैला अधर्म, भ्रष्टाचार और छल कपट का अंधेरा और किरण का अर्थ है सच्चाई, ईमानदारी और न्याय की रोशनी।
अगर आप छात्र हैं, और बोर्ड परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं तो इस पूरे नाटक का सारांश बहुत ही सरल आसान और स्पष्ट भाषा में यहां प्रस्तुत है। अगर आप इस नाटक को पूरा पढ़ लेते हैं जो यहां पर मैंने लिखा है, तो आपके परीक्षा में बनने वाले प्रश्न एक भी गलत नहीं होंगे इस नाटक से।
कुहासा और किरण नाटक: एक नजर में -
नाटक की पृष्ठभूमि (अतीत का सच) -
कहानी को समझने से पहले इसके इतिहास को जानना जरूरी है। आजादी से पहले मुल्तान में अंग्रेजों के खिलाफ पांच देशभक्तों ने मिलकर क्रांति की योजना बनाई। उनमें से चार सच्चे देशभक्त थे। चंद्रशेखर, राजेंद्र, चंदन और हाशमी।
लेकिन पांचवा साथी कृष्णदेव निकला। जो धोखेबाज था उसने अंग्रेजों से हाथ मिला लिया और अपने ही साथियों को जेल भिजवा दिया।
आजादी के बाद वही धोखेबाज कृष्णदेव अपना नाम बदलकर कृष्णा चैतन्य रख लेता है और समाज में एक महान देशभक्त तथा समाज सेवक का मुखौटा पहनकर बड़े-बड़े घोटाले करता है। दूसरी तरफ सच्चे देशभक्तों के परिवार गरीबी और दुखों में जीवन बिताते हैं।
नाटक का विस्तृत सारांश (तीन अंको में) -
प्रथम अंक: नेताजी का उत्सव और सच्चाई की शुरुआत
नाटक की शुरुआत नेताजी यानी कृष्ण चैतन्य के घर से होती है। वह अपना 60वां जन्मदिन माना रहे हैं। सब लोग उन्हें बधाई दे रहे हैं और उन्हें एक महान नेता मानते हैं। वहां अमूल नाम का एक ईमानदार और पढ़ा लिखा नवयुवक आता है। अमूल उसी शहीद देशभक्त राजेंद्र का बेटा है। कृष्ण चैतन्य की सेक्रेटरी सुंदरा भी एक साहसी लड़की है।
इसी बीच वहां मालती नाम की एक दुखी महिला आती है। मालती शहीद चंद्रशेखर की पत्नी है। जो अब बीमार और बेसहारा है। वह अपनी पेंशन बनवाने आई है। वह कृष्ण चैतन्य को देखते ही पहचान लेती है कि यह कोई महान नेता नहीं बल्कि गद्दार कृष्ण देव है जिसने उनके पति को जेल भिजवाया था।
कृष्ण चैतन्य डर जाता है कि उसकी पोल ना खुल जाए इसलिए वह अमूल्य को अपने रास्ते से हटाने के लिए उसे विपिन बिहारी के पास नौकरी पर भिजवा देता है।
द्वितीय अंकुश षड्यंत्र और पर्दाफाश
दूसरे अंक में अमूल्य, विपिन बिहारी के दफ्तर में काम करने लगता है। अमूल्य को भी धीरे-धीरे कृष्ण चैतन्य के काले कारनामों का सच पता चल जाता है। सुंदरा विपिन बिहारी से कहती है कि वह अपने अखबार में कृष्ण चैतन्य का असली चेहरा जनता के सामने लाएं लेकिन विपिन बिहारी खुद लालची है इसलिए वह मना कर देता है।
जब कृष्ण चैतन्य को लगता है की अमूल्य उसका पर्दाफाश कर देगा, तो वह अमूल्य को एक झूठ कागज चोरी के केस में फंसा देता है। पुलिस अमूल्य पर बहुत अत्याचार करती है। अमूल्य दुखी होकर आत्महत्या करने की कोशिश करता है, लेकिन पुलिस उसे बचाकर अस्पताल पहुंचाती है।
यह सब देखकर कृष्ण चैतन्य की पत्नी गायत्री (जो एक बहुत ही धर्मपरायण और अच्छी महिला थी) को अपने पति के पापों पर बहुत गुस्सा आती है। वह अपने पति को समझाती है लेकिन कृष्ण चैतन्य नहीं मानता, तो गायत्री की एक सड़क हादसे में मौत हो जाती है।
तृतीय अंक: पश्चाताप जेल और न्याय की जीत
तीसरी अंक में पत्नी गायत्री की मौत के बाद कृष्ण चैतन्य टूट जाता है। उसे अपनी गलतियों और पापों का एहसास होने लगता है। गायत्री की मौत वास्तव में अपने पति के पापों के कारण हुई एक तरह की आत्महत्या थी।
सुंदरा पुलिस के बड़े अधिकारी को लेकर वहां पहुंचती है। अमूल्य अस्पताल से ठीक होकर आ जाता है, और उसे निर्दोष साबित कर दिया जाता है।
कृष्ण चैतन्य पुलिस के सामने अपने सारे पाप कबूल कर लेता है। वह बताता है कि उसने ही मुल्तान केस में अपने दोस्तों से गद्दारी की थी, और अमूल्य को झूठे केस में फसाया था। वह अपने भ्रष्ट साथियों (विपिन, बिहारी और उमेशचंद्र) का नाम भी पुलिस को बता देता है। कृष्ण चैतन्य अपनी बची हुई सारी धन दौलत और जायदाद बेसहारा मालती के नाम कर देता है। इसके बाद पुलिस कृष्ण चैतन्य और उसके भ्रष्ट साथियों को गिरफ्तार करके ले जाती है। अमूल्य पूरी तरह से बेदाग और आजाद हो जाता है।
इसी के साथ नाटक का अंत होता है।
मुख्य पात्रों का चरित्र चित्रण -
अमूल्य :
- अमूल एक सच्चा, पढ़ा लिखा और ईमानदार नवयुवक है।
- वह शहीद का बेटा है, इसलिए उसके खून में ही देशभक्ति है।
- पुलिस के अत्याचार सहने के बाद भी वह सच का रास्ता नहीं छोड़ना।
कृष्ण चैतन्य (खलनायक) :
- वह एक ढोंगी और बगुला भगत नेता है।
- बाहर से वह समाज सेवक बनता है, लेकिन अंदर से देशद्रोही और घोटालेबाज है।
- अंत में अपनी पत्नी की मौत के बाद उसे अपनी गलती का एहसास होता है।
सुंदर:
- वह कृष्ण चैतन्य की सेक्रेटरी है, लेकिन गलत काम का कभी साथ नहीं देती।
- वह निडर होकर पुलिस और समाज के सामने सच लाने में अमूल्य की मदद करती है।
गायत्री (त्याग की मूर्ति):
- वह कृष्ण चैतन्य की पत्नीहै।
- वह बहुत ही सिरी और धन पारायण स्त्री है। अपने पति के बुरे कामों का दु:ख ना सह पाने के कारण वह अपनी जान दे देती है।
नाटक का संदेश और उद्देश्य -
विष्णु प्रभाकर जी ने इस नाटक के जरिए छात्रों को यह संदेश दिया है:
- सत्य की हमेशा जीत होती है: पाप और भ्रष्टाचार का कुहासा (अंधेरा) चाहे कितना भी गहरा क्यों ना हो सत्य की किरण (रोशनी) एक न एक दिन उसे अंधेरे को मिटा ही देती है।
- नकली देश प्रेम का अंत: जो लोग देशभक्ति का नाटक करके देश को अंदर से खोखला करते हैं, उनका अंजाम हमेशा बुरा होता है।
- युवाओं की जिम्मेदारी: अमूल्य की तरह आज के युवाओं को भी समाज से भ्रष्टाचार मिटाने के लिए हमेशा निडर और ईमानदार बने रहना चाहिए।
परीक्षा के लिए जरूरी दो मुख्य प्रश्न उत्तर-
प्रश्न 1: कुहासा और किरण नाटक से हमें क्या शिक्षा मिलती है?
उत्तर : इस नाटक से हमें यह शिक्षा मिलती है कि हमें कभी भी अन्याय और भ्रष्टाचार के आगे झुकना नहीं चाहिए छल और कपट का रास्ता थोड़े समय के लिए फायदा दे सकता है, लेकिन जीत हमेशा सच्चाई की ही होती है।
प्रश्न 2: कृष्ण चैतन्य का हृदय परिवर्तन कैसे हुआ?
उत्तर : जब कृष्ण चैतन्य के पापों से दुखी होकर उसकी निर्दोष पत्नी गायत्री की मौत हो जाती है, तो वह अंदर से पूरी तरह टूट जाता है। पत्नी के इस बड़े त्याग को देखकर उसका हृदय परिवर्तन हो जाता है, और वह पुलिस के सामने अपने सारे गुनाह कबूल कर लेता है।
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